महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1394, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंषडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डववीरोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, द्रुपदके पौत्रों तथा द्रुपद एवं विराट आदिका वध, धृष्टद्युम्नकी प्रतिज्ञा और दोनों दलोंमें घमासान युद्ध
संजय उवाच
त्रिभागमात्रशेषायां रात्र्यां युद्धमवर्तत ।
कुरूणां पाण्डवानां च संहृष्टानां विशाम्पते ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—प्रजानाथ! उस समय जब रात्रिके पंद्रह मुहूर्तोंमेंसे तीन मुहूर्त ही शेष रह गये थे, हर्ष तथा उत्साहमें भरे हुए कौरवों तथा पाण्डवोंका युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १ ॥
अथ चन्द्रप्रभां मुष्णन्नादित्यस्य पुरःसरः ।
अरुणोऽभ्युदयांचक्रे ताम्रीकुर्वन्त्रिवाम्बरम् ॥ २ ॥
तदनन्तर सूर्यके आगे चलनेवाले अरुणका उदय हुआ, जो चन्द्रमाकी प्रभाको छीनते हुए पूर्व दिशाके आकाशमें लालिमा-सी फैला रहे थे ॥ २ ॥
प्राच्यां दिशि सहस्रांशोररुणेनारुणीकृतम् ।
तपनीयं यथा चक्रं भ्राजते रविमण्डलम् ॥ ३ ॥
प्राचीमें अरुणके द्वारा अरुण किया हुआ सूर्यदेवका मण्डल सुवर्णमय चक्रके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३ ॥
ततो रथांश्वांश्च मनुष्ययाना-
न्युत्सृज्य सर्वे कुरुपाण्डुयोधाः ।
दिवाकरस्याभिमुखं जपन्तः
संध्यागताः प्राञ्जलयो बभूवुः ॥ ४ ॥
तब समस्त कौरव-पाण्डव-सैनिक रथ, घोड़े तथा पालकी आदि सवारियोंको छोड़कर संध्या-वन्दनमें तत्पर हो सूर्यके सम्मुख हाथ जोड़कर वेदमन्त्रका जप करते हुए खड़े हो गये ॥ ४ ॥
ततो द्वैधीकृते सैन्ये द्रोणः सोमकपाण्डवान् ।
अभ्यद्रवत् सपाञ्चालान् दुर्योधनपुरोगमः ॥ ५ ॥
तदनन्तर सेनाके दो भागोंमें विभक्त हो जानेपर द्रोणाचार्यने दुर्योधनके आगे होकर सोमकों, पाण्डवों तथा पांचालोंपर धावा किया ॥ ५ ॥
द्वैधीकृतान् कुरून् दृष्ट्वा माधवोऽर्जुनमब्रवीत् ।
सपत्नान् सव्यतः कृत्वा अपसव्यमिमं कुरु ॥ ६ ॥