महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1498, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण
धृतराष्ट्र उवाच
साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना ।
यस्मिन् साक्षाद् धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठितः ॥ १ ॥
यस्य प्रसादात् कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभाः ।
अमानुषाणि संग्रामे देवैरसुकराणि च ॥ २ ॥
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा ।
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ॥ ३ ॥
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक् क्षात्रं धिगमर्षिताम् ।
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जिन महात्माने विधिपूर्वक अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, जिन लज्जाशील सत्पुरुषमें साक्षात् धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनके कृपाप्रसादसे कितने ही पुरुषरत्न योद्धा संग्रामभूमिमें ऐसे-ऐसे अलौकिक पराक्रम कर दिखाते थे, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थे; उन्हीं द्रोणाचार्यकी वह पापी, नीच, नृशंस, क्षुद्र और गुरुघाती धृष्टद्युम्न सबके सामने निन्दा कर रहा था और लोग क्रोध नहीं प्रकट करते थे। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियोंको! और धिक्कार है उनके अमर्षशील स्वभावको!! ।। १—३ ½ ।।
पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः ॥ ४ ॥
श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्व संजय ।
संजय! भूमण्डलके जो-जो धनुर्धर नरेश वहाँ उपस्थित थे, उन सबने तथा कुन्तीके पुत्रोंने धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर उससे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥ ४ ½ ॥
संजय उवाच
श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः ॥ ५ ॥
तूष्णीं बभूवू राजानः सर्व एव विशाम्पते ।
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं विप्रेक्ष्य पार्षतम् ॥ ६ ॥
सबाष्पमतिनिःश्वस्य धिग् धिगित्येव चाब्रवीत् ।
**संजयने कहा—**प्रजानाथ! क्रूरकर्मा द्रुपदपुत्रकी वे बातें सुनकर वहाँ बैठे हुए सभी नरेश मौन रह गये। केवल अर्जुन टेढ़ी नजरोंसे उसकी ओर देखकर आँसू बहाते हुए दीर्घ