महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1499, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिःश्वास ले इतना ही बोले कि—'धिक्कार है! धिक्कार है!!' ।। ५-६½ ।।
युधिष्ठिरश्च भीमश्च यमौ कृष्णस्तथापरे ।। ७ ।।
आसन् सुव्रीडिता राजन् सात्यकिस्त्वब्रवीदिदम् ।
राजन्! उस समय युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग भी अत्यन्त लज्जित हो चुप ही बैठे रहे, परंतु सात्यकि इस प्रकार बोल उठे— ।। ७½ ।।
नेहास्ति पुरुषः कश्चिद् य इमं पापपूरुषम् ।। ८ ।।
भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् ।
'क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस प्रकार अभद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले इस पापी नराधमको शीघ्र ही मार डाले ।। ८½ ।।
एते त्वां पाण्डवाः सर्वे कुत्सयन्ति विकुत्सया ।। ९ ।।
कर्मणा तेन पापेन श्वपाकं ब्राह्मणा इव ।
'धृष्टद्युम्न! जैसे ब्राह्मण चाण्डालकी निन्दा करते हैं, उसी प्रकार ये समस्त पाण्डव उस पाप कर्मके कारण अत्यन्त घृणा प्रकट करते हुए तेरी निन्दा कर रहे हैं ।। ९½ ।।
एतत् कृत्वा महत् पापं निन्दितः सर्वसाधुभिः ।। १० ।।
न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम् ।
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते ।। ११ ।।
गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे ।
'यह महान् पाप करके तू समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंकी दृष्टिमें निन्दाका पात्र बन गया है। साधु पुरुषोंकी इस सुन्दर सभामें पहुँचकर ऐसी बातें करते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती? तेरी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते और तेरा मस्तक क्यों नहीं फट जाता? ओ नीच! गुरुकी निन्दा करते हुए तेरा इस पापसे पतन क्यों नहीं हो जाता? ।। १०-११½ ।।
वाच्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः ।। १२ ।।
यत् कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि ।
'तू पापकर्म करके जनसमाजमें जो इस तरह अपनी बड़ाई कर रहा है, इसके कारण तू कुन्तीके सभी पुत्रों तथा अन्धक और वृष्णिवंशके यादवोंद्वारा निन्दाके योग्य हो गया है ।। १२½ ।।
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् ।। १३ ।।
वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तंमपि जीवता ।
'वैसा पापकर्म करके तू पुनः गुरुपर आक्षेप कर रहा है; अतः तू वध करनेके ही योग्य है। एक मुहूर्त भी तेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है ।। १३½ ।।
कस्त्वेतद् व्यवसेदार्यस्त्वदन्यः पुरुषाधम ।। १४ ।।