महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1500, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिगृह्य केशेषु वधं गुरोर्धर्मात्मनः सतः ।
‘पुरुषाधम! तेरे सिवा दूसरा कौन श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्मा सज्जन गुरुके केश पकड़कर उनके वधका विचार भी मनमें लायेगा ॥ १४ १/२ ॥
सप्तावरे तथा पूर्वे बान्धवास्ते निमज्जिताः ॥ १५ ॥
यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् ।
‘तुझ-जैसे कुलांगारको पाकर तेरे सात पीढ़ी पहलेके और सात पीढ़ी आगे होनेवाले बन्धु-बान्धव नरकमें डूब गये तथा सदाके लिये सुयशसे वंचित हो गये ॥ १५ १/२ ॥
उक्तवांश्चापि यत् पार्थे भीष्मं प्रति नरर्षभम् ॥ १६ ॥
तथान्तो विहितस्तेन स्वयमेव महात्मना ।
तूने जो कुन्तीकुमार अर्जुनपर नरश्रेष्ठ भीष्मके वधका दोष लगाया है, वह भी व्यर्थ ही है; क्योंकि महात्मा भीष्मने स्वयं ही उसी प्रकार अपनी मृत्युका विधान किया था ॥ १६ १/२ ॥
तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः ॥ १७ ॥
नान्यः पाञ्चाल्यपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् ।
‘वास्तवमें भीष्मका वध करनेवाला भी तेरा महान् पापाचारी भाई ही है। इस पृथ्वीपर पांचालराजके पुत्रोंके सिवा दूसरा कोई ऐसा पाप करनेवाला नहीं है ॥ १७ १/२ ॥
स चापि सृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल ॥ १८ ॥
शिखण्डी रक्षितस्तेन स च मृत्युर्महात्मनः ।
‘यह प्रसिद्ध है कि उसे भी तेरे पिताने भीष्मका अन्त करनेके लिये उत्पन्न किया था; उन्होंने महात्मा भीष्मकी मूर्तिमान् मृत्युके रूपमें ही शिखण्डीको सुरक्षित रखा था ॥ १८ १/२ ॥
पञ्चालाश्चलिता धर्मात् क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः ॥ १९ ॥
त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ।
‘तू और तेरा भाई दोनों समस्त साधु पुरुषोंके धिक्कारके पात्र हैं। तुम दोनोंको पाकर सारे पांचाल धर्मभ्रष्ट, नीच, मित्रद्रोही तथा गुरुद्रोही बन गये हैं ॥
पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि ॥ २० ॥
शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
‘यदि तू पुनः मेरे समीप ऐसी बात बोलेगा तो मैं अपनी इस वज्रतुल्य गदासे तेरा सिर कुचल दूँगा ॥
त्वां च ब्रह्महणं दृष्ट्वा जनः सूर्यमवेक्षते ॥ २१ ॥
ब्रह्महत्या हि ते पापं प्रायश्चित्तार्थमात्मनः ।