महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1501, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘तुझे ब्रह्महत्याका पाप लगा है। तुझ ब्रह्महत्यारेको देखकर लोग अपने प्रायश्चित्तके लिये सूर्यदेवका दर्शन करते हैं।। २१ ½ ।। पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रतः ।। २२ ।। गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे । ‘दुराचारी पांचाल! तू मेरे आगे मेरे ही गुरु तथा मेरे गुरुके भी गुरुपर बारंबार आक्षेप कर रहा है, तो भी तुझे लज्जा नहीं आती।। २२ ½ ।। तिष्ठ तिष्ठ सहस्वैकं गदापातमिमं मम ।। २३ ।। तव चापि सहिष्येऽहं गदापाताननेकशः । ‘खड़ा रह, खड़ा रह', मेरी गदाकी यह एक ही चोट सह ले, फिर मैं तेरी गदाकी भी अनेक चोटें सहन करूँगा’ ।। २३ ½ ।। सात्वतेनैवमाक्षिप्तः पार्षतः परुषाक्षरम् ।। २४ ।। संरब्धं सात्यकिं प्राह संक्रुद्धः प्रहसन्निव । सात्वतवंशी सात्यकिके इस प्रकार कठोर वचन कहकर आक्षेप करनेपर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर वे भी क्रोधमें भरे हुए सात्यकिसे हँसते हुए-से बोले।।
धृष्टद्युम्न उवाच
श्रूयते श्रूयते चेति क्षम्यते चेति माधव ।। २५ ।। सदानार्योऽशुभः साधुं पुरुषं क्षेप्तुमिच्छति । धृष्टद्युम्नने कहा—माधव! मैं तेरी यह बात सुनता हूँ, सुनता हूँ और इसके लिये तुझे क्षमा भी करता हूँ। दुष्ट और अनार्य पुरुष सदा साधु जनोंपर ऐसे ही आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हैं।। २५ ½ ।। क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् ।। २६ ।। क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते । यद्यपि लोकमें क्षमाभावकी प्रशंसा की जाती है, तथापि पापात्मा मनुष्य कभी क्षमाके योग्य नहीं है; क्योंकि क्षमा कर देनेपर वह पापात्मा क्षमाशील पुरुषको ऐसा समझ लेता है कि ‘यह मुझसे हार गया’ ।। २६ ½ ।। स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चयः ।। २७ ।। आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि । तू स्वयं ही दुराचारी, नीच और पापपूर्ण विचार रखनेवाला है। नखसे शिखातक पापमें डूबा होनेके कारण निन्दाके योग्य है, तथापि दूसरोंकी निन्दा करना चाहता है ।। २७ ½ ।। यः स भूरिश्रवाश्छिन्नभुजः प्रायगतस्त्वया ।। २८ ।। वार्यमाणेण हि हतस्ततः पापतरं नु किम् ।