महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1502, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूरिश्रवाकी बाँह काट डाली गयी थी। वे आमरण उपवासका नियम लेकर चुपचाप बैठे हुए थे। उस दशामें सबके मना करनेपर भी जो तूने उनका वध किया, इससे बढ़कर महान् पापकर्म और क्या हो सकता है? ।। २८१/२ ।।
गाहमानो मया द्रोणो दिव्यैनास्त्रेण संयुगे ।। २९ ।। विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् । ओ क्रूर! मैंने तो पहलेसे ही युद्धके मैदानमें दिव्यास्त्रद्वारा द्रोणाचार्यको मथ डाला था। फिर वे हथियार डालकर मारे गये, तो उसमें मैंने कौन-सा पाप कर डाला ।। २९१/२ ।।
अयुध्यमानं यस्त्वाजौ तथा प्रायगतं मुनिम् ।। ३० ।। छिन्नबाहुं परैर्हन्यात् सात्यके स कथं वदेत् । सात्यके! जो युद्धस्थलमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले आमरण उपवासका निश्चय लेकर बैठ गया हो, जो अपने साथ युद्ध न कर रहा हो तथा जिसकी बाँह भी शत्रुओंन्द्वारा काट डाली गयी हो, ऐसे पुरुषको जो मार सकता है, वह दूसरेकी निन्दा कैसे कर सकता है? ।।
निहत्य त्वां पदा भूमौ स विकर्षति वीर्यवान् ।। ३१ ।। किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः । जिस समय पराक्रमी भूरिश्रवा तुझे लातसे मारकर धरतीपर घसीट रहे थे, तू बड़ा श्रेष्ठ पुरुष था, तो उसी समय उन्हें क्यों नहीं मार डाला? ।। ३११/२ ।।
त्वया पुनरनाय्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः ।। ३२ ।। यदा तदा हतः शूरः सौमदत्तिः प्रतापवान् । जब अर्जुनने पहले ही प्रतापी शूरवीर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको परास्त कर दिया, उस समय तूने उनका वध किया। तू कितना नीच है? ।। ३२१/२ ।।
यत्र यत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावयते चमूम् ।। ३३ ।। किरन् शरसहस्राणि तत्र तत्र प्रयाक्यहम् । द्रोणाचार्य जहाँ-जहाँ पाण्डव-सेनाको खदेड़ते थे, वहीं-वहीं मैं जा पहुँचता और सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उनके छक्के छुड़ा देता था ।। ३३१/२ ।।
स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चाण्डालवत् स्वयम् ।। ३४ ।। वक्तुमर्हसि वक्तव्यः कस्मात् त्वं परुषाण्यथ । जब तू स्वयं ही चाण्डालके समान ऐसा पाप-कर्म करके निन्दाका पात्र बन गया है, तब दूसरेको कटु वचन सुनानेका कैसे अधिकारी हो सकता है? ।। ३४१/२ ।।
कर्ता त्वं कर्मणो ह्यस्य नाहं वृष्णिकुलाधम ।। ३५ ।। पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद । वृष्णिकुलकलंक! तू ही ऐसे-ऐसे पाप करनेवाला और पाप-कर्मोंका भण्डार है, मैं नहीं। अतः फिर ऐसी बातें मुँहसे न निकालना ।। ३५१/२ ।।