महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1503, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजोषमास्स्व न मां भूयो वक्तुमर्हस्यतः परम् ।। ३६ ।। अधरोत्तरमेतद्धि यन्मां त्वं वक्तुमर्हसि । चुपचाप बैठा रह; अब फिर ऐसी बातें तुझे नहीं कहनी चाहिये। तू मुझसे जो कुछ कहना चाहता है, वह तेरी बड़ी भारी नीचता है ।। ३६१/२ ।।
अथ वक्ष्यसि मां मौर्ख्याद् भूयः परुषमीदृशम् ।। ३७ ।। गमयिष्यामि बाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षयम् । यदि मूर्खतावश तू पुनः मुझसे ऐसी कठोर बातें कहेगा, तो युद्धमें बाणोंद्वारा मैं अभी तुझे यमलोक भेज दूँगा ।।
न चैवं मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते ।। ३८ ।। तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् । ओ मूर्ख! केवल धर्मसे ही युद्ध नहीं जीता जा सकता। उन कौरवोंकी भी जो अधर्मपूर्ण चेष्टाएँ हुई हैं, उन्हें सुन ले ।। ३८१/२ ।।
वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः ।। ३९ ।। द्रौपदी च परिक्लिष्टा तथाधर्मेण सात्यके । सात्यके! सबसे पहले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको अधर्मपूर्वक छला गया। फिर अधर्मसे ही द्रौपदीको अपमानित किया गया ।। ३९१/२ ।।
प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया ।। ४० ।। सर्वस्वमपकृष्टं च तथाधर्मेण बालिश । ओ मूर्ख! समस्त पाण्डवोंको जो द्रौपदीके साथ वनमें भेज दिया गया और उनका सर्वस्व छीन लिया गया, वह भी अधर्मका ही कार्य था ।। ४०१/२ ।।
अधर्मेणापकृष्टश्च मद्राजः परैारितः ।। ४१ ।। अधर्मेण तथा बालः सौभद्रो विनिपातितः । शत्रुओंने अधर्मसे ही छलकर मद्राज शल्यको अपने पक्षमें खींच लिया और सुभद्राके बालक पुत्र अभिमन्युको भी अधर्मसे ही मार डाला था ।। ४११/२ ।।
इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः परपुरंजयः ।। ४२ ।। भूरिश्रवा ह्यधर्मेण त्वया धर्मविदा हतः । इस पक्षसे भी अधर्मके द्वारा ही शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्म मारे गये हैं और तू बड़ा धर्मज्ञ बनता है पर तूने भी अधर्मसे ही भूरिश्रवाका वध किया है ।।
एवं परैराचरितं पाण्डवेयैश्च संयुगे ।। ४३ ।। रक्षमाणैर्जयं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ।