भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1504

सात्वत! इस प्रकार धर्मके जाननेवाले वीर पाण्डवों तथा शत्रुओंने भी युद्धके मैदानमें अपनी विजयको सुरक्षित रखनेके लिये समय-समयपर अधर्मपूर्ण बर्ताव किया है ॥ ४३ १/२ ॥

दुर्ज्ञेयः स परो धर्मस्तथाधर्मश्च दुर्विदः ॥ ४४ ॥
युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गा पितृनिवेशनम् ।
उत्तम धर्मका स्वरूप जानना अत्यन्त कठिन है। अधर्म क्या है? इसे समझना भी सरल नहीं है। अब तू कौरवोंके साथ पूर्ववत् युद्ध कर। मुझसे विवाद करके पितृलोकमें जानेकी तैयारी न कर ॥ ४४ १/२ ॥

संजय उवाच

एवमादीनि वाक्यानि क्रूराणि परुषाणि च ॥ ४५ ॥
श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ।
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् ॥ ४६ ॥
विनिःश्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय रथे धनुः ।
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ।
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कितने ही क्रूर एवं कठोर वचन धृष्टद्युम्नने श्रीमान् सात्यकिको सुनाये। उन्हें सुनकर वे क्रोधसे काँपने लगे। उनकी आँखें लाल हो गयीं तथा उन्होंने सर्पके समान लंबी साँस खींचकर धनुषको तो रथपर रख दिया और हाथमें गदा उठा ली। फिर वे धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर बड़े रोषके साथ इस प्रकार बोले—'अब मैं तुझसे कठोर वचन नहीं कहूँगा। तू वधके ही योग्य है, अतः तुझे मार ही डालूँगा ॥ ४५—४७ १/२ ॥

तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् ॥ ४८ ॥
पाञ्चाल्यायाभिसंक्रुद्धमन्तकायान्तकोपमम् ।
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महाबलः ॥ ४९ ॥
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत् ।
महाबली, अमर्षशील एवं अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए यमराज-तुल्य सात्यकि जब सहसा कालस्वरूप धृष्टद्युम्नकी ओर बढ़े, तब भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाबली भीमसेनने तुरंत ही रथसे कूदकर उन्हें दोनों हाथोंसे रोक लिया ॥ ४८-४९ १/२ ॥

द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो बली ॥ ५० ॥
प्रस्पन्दमानमादाय जगाम बलिनं बलात् ।
क्रोधपूर्वक आगे बढ़ते और झपटते हुए बलवान् सात्यकिको महाबली पाण्डुपुत्र भीमने थामकर साथ-साथ चलना आरम्भ किया ॥ ५० १/२ ॥