भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1505

स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः ॥ ५१ ॥ निगृहीतः पदे षष्ठे बलेन बलिनां वरः । फिर भीमने खड़े होकर अपने दोनों पैर जमा दिये और बलवानोंमें श्रेष्ठ शिनिप्रवर सात्यकिको छठे कदमपर बलपूर्वक काबूमें कर लिया ॥ ५१ १/२ ॥

अवरुह्य रथात् तूर्णं ध्रियमाणं बलीयसा ॥ ५२ ॥ उवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशाम्पते । प्रजानाथ! इतनेहीमें सहदेव भी तुरंत ही रथसे उतर पड़े और महाबली भीमसेनके द्वारा पकड़े गये सात्यकिसे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ ५२ १/२ ॥

अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते ॥ ५३ ॥ परमन्धकवृष्णिभ्यः पञ्चालेभ्यश्च मारिष । तथैवान्धकवृष्णीनां तथैव च विशेषतः ॥ ५४ ॥ कृष्णस्य च तथास्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते । ‘माननीय पुरुषसिंह! अन्धक और वृष्णिवंशके यादवों तथा पांचालोंसे बढ़कर दूसरा कोई हमलोगोंका मित्र नहीं है। इसी प्रकार अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंका तथा विशेषतः श्रीकृष्णका हमलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है ॥ ५३-५४ १/२ ॥

पञ्चालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम् ॥ ५५ ॥ नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णयः । ‘वार्ष्णेय! पांचाल लोग भी यदि समुद्रतककी सारी पृथ्वी खोज डालें, तो भी उन्हें दूसरा कोई वैसा मित्र नहीं मिलेगा, जैसे उनके लिये पाण्डव और वृष्णिवंशके लोग हैं ॥ ५५ १/२ ॥

स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् ॥ ५६ ॥ भवन्तश्च यथास्माकं भवतां च तथा वयम् । ‘आप भी हमारे ऐसे ही मित्र हैं, जैसा कि आप स्वयं भी मानते हैं। आपलोग जैसे हमारे मित्र हैं, वैसे ही हम भी आपके हैं ॥ ५६ १/२ ॥

स एवं सर्वधर्मज्ञ मित्रधर्ममनुस्मरन् ॥ ५७ ॥ नियच्छ मन्युं पाञ्चाल्यात् प्रशाम्य शिनिपुङ्गव । पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां पार्षतश्च ते ॥ ५८ ॥ वयं क्षमयितारश्च किमन्यत्र शमाद् भवेत् । ‘सब धर्मोंके ज्ञाता शिनिप्रवर! इस प्रकार मित्रधर्मका विचार करके आप धृष्टद्युम्नकी ओरसे अपने क्रोधको रोकें और शान्त हो जायँ, आप धृष्टद्युम्नके और धृष्टद्युम्न आपके अपराधको क्षमा कर लें। हमलोग केवल क्षमा-प्रार्थना करनेवाले हैं; शान्तिसे बढ़कर श्रेष्ठ वस्तु और क्या हो सकती है?’ ॥ ५७-५८ १/२ ॥

प्रशाम्यमाने शैनेये सहदेवेन मारिष ॥ ५९ ॥