महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1506, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाञ्चालराजस्य सुतः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
माननीय नरेश! जब सहदेव सात्यकिको इस प्रकार शान्त कर रहे थे, उस समय पांचालराजके पुत्रने हँसकर इस प्रकार कहा— ॥ ५९ १/२ ॥
मुञ्च मुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् ॥ ६० ॥
आसादयतु मामेष धराधरमिवानिलः ।
यावदस्य शितैर्बाणैः संरम्भं विनयाम्यहम् ॥ ६१ ॥
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे ।
‘भीमसेन! शिनिके इस पौत्रको अपने युद्ध-कौशलपर बड़ा घमंड है। तुम इसे छोड़ दो, छोड़ दो। जैसे हवा पर्वतसे आकर टकराती है, उसी प्रकार यह मुझसे आकर भिड़े तो सही। कुन्तीनन्दन! मैं अभी तीखे बाणोंसे इसका क्रोध उतार देता हूँ। साथ ही इसका युद्धका हौसला और जीवन भी समाप्त किये देता हूँ ॥ ६०-६१ १/२ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं कार्यं यदिदमुद्यतम् ॥ ६२ ॥
सुमहत् पाण्डुपुत्राणामायान्त्येते हि कौरवाः ।
‘परंतु मैं इस समय क्या कर सकता हूँ। पाण्डवोंका यह दूसरा ही महान् कार्य उपस्थित हो गया। ये कौरव बढ़े चले आ रहे हैं ॥ ६२ १/२ ॥
अथवा फाल्गुनः सर्वान् वारयिष्यति संयुगे ॥ ६३ ॥
अहमप्यस्य मूर्धानं पातयिष्यामि सायकैः ।
मन्यते छिन्नबाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे ॥ ६४ ॥
उत्सृजैनमहं चैनमेष वा मां हनिष्यति ।
‘अथवा केवल अर्जुन युद्धके मैदानमें इन समस्त कौरवोंको रोकेंगे, तबतक मैं भी अपने बाणोंद्वारा इस सात्यकिका मस्तक काट गिराऊँगा। यह मुझे भी रणभूमिमें कटी हुई बाँहवाला भूरिश्रवा समझता है। तुम छोड़ दो इसे। या तो मैं इसे मार डालूँगा या यह मुझे’ ॥
शृण्वन् पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् ॥ ६५ ॥
भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली ।
भीमसेनकी भुजाओंमें फँसे हुए बलवान् सात्यकि धृष्टद्युम्नकी बातें सुनकर फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए निरन्तर छूटनेकी चेष्टा कर रहे थे ॥ ६५ १/२ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ बाहुशालिनौ ॥ ६६ ॥
त्वरया वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष ।
यत्नेन महता वीरौ वारयामासतुस्ततः ॥ ६७ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर दो साँड़ोंके समान गरज रहे थे। माननीय नरेश! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्रतापूर्वक महान् प्रयत्न करके उन दोनों वीरोंको रोका ॥ ६६-६७ ॥