महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1520, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका भीमसेनको रथसे उतारकर नारायणास्त्रको शान्त करना, अश्वत्थामाका उसके पुनः प्रयोगमें अपनी असमर्थता बताना तथा अश्वत्थामाद्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय, सात्यकिका दुर्योधन, कृपाचार्य, कृतवर्मा, कर्ण और वृषसेन—इन छः महारथियोंको भगा देना फिर अश्वत्थामाद्वारा मालव, पौरव और चेदिदेशके युवराजका वध एवं भीम और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा पाण्डव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
भीमसेनं समाकीर्णं दृष्ट्वास्त्रेण धनंजयः ।
तेजसः प्रतिघातार्थं वारुणेन समावृणोत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भीमसेनको उस अस्त्रसे घिरा हुआ देख अर्जुनने उन्हें उसके तेजका निवारण करनेके लिये वारुणास्त्रसे ढक दिया ॥ १ ॥
नालक्षयत तत् कश्चिद् वारुणास्त्रेण संवृतम् ।
अर्जुनस्य लघुत्वाच्च संवृतत्वाच्च तेजसः ॥ २ ॥
एक तो अर्जुनने बड़ी फुर्ती की थी, दूसरे भीमसेनपर उस अस्त्रके तेजका आवरण था, इससे कोई भी यह देख न सका कि भीमसेन वारुणास्त्रसे घिरे हुए हैं ॥ २ ॥
साश्वसूतस्थो भीमो द्रोणपुत्रास्त्रसंवृतः ।
अग्नावग्निरिव न्यस्तो ज्वालामाली सुदुर्द्दशः ॥ ३ ॥
घोड़े, सारथि और रथसहित भीमसेन द्रोणपुत्रके उस अस्त्रसे ढककर आगके भीतर रखी हुई आगके समान प्रतीत होते थे। वे ज्वालाओंसे इतने घिर गये थे कि उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ३ ॥
यथा रात्रिक्षये राजन् ज्योतींष्यस्तागिरिं प्रति ।
समापेतुस्तथा बाणा भीमसेनरथं प्रति ॥ ४ ॥
राजन्! जैसे रात्रि समाप्त होनेके समय सारे ज्योतिर्मय ग्रह-नक्षत्र अस्ताचलकी ओर चले जाते हैं, उसी प्रकार अश्वत्थामाके बाण भीमसेनके रथपर गिरने लगे ॥ ४ ॥
स हि भीमो रथश्चास्य हयाः सूतश्च मारिष ।
संवृता द्रोणपुत्रेण पावकान्तर्गताऽभवन् ॥ ५ ॥