महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1554, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस तेन तपसा तात ब्रह्मभूतो यदाभवत् । ततो विश्वेश्वरं योनिं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ६१ ॥ ददर्श भृशदुर्धर्षं सर्वदेवैरभिष्टुतम् । अणीयांसमणुभ्यश्च बृहद्भ्यश्च बृहत्तमम् ॥ ६२ ॥ तात! उस तपस्यासे जब वे साक्षात् ब्रह्मस्वरूपमें स्थित हो गये, तब उन्हें उन भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन हुआ जो सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्ति-स्थान और जगत्के पालक हैं, जिन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन (असम्भव) है। सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्से भी परम महान् हैं ॥ ६१-६२ ॥
रुद्रमीशानवृषभं हरं शम्भुं कपर्दिनम् । चेकितानं परां योनिं तिष्ठतो गच्छतश्च ह ॥ ६३ ॥ वे 'रु' अर्थात् दुःखको दूर करनेके कारण रुद्र कहलाते हैं। ब्रह्मा आदि लोकपालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। पापहारी, कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले तथा जटाजूटधारी हैं। वे ही सबको चेतना प्रदान करते हैं और वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके परम कारण हैं ॥ ६३ ॥
दुर्वारणं दुर्द्दशं तिग्ममन्युं महात्मानं सर्वहरं प्रचेतसम् । दिव्यं चापमिषुधी चाददानं हिरण्यवर्म्माणमनन्तवीर्यम् ॥ ६४ ॥ उन्हें कहीं कोई रोक नहीं सकता, उनका दर्शन बड़ी कठिनाईसे होता है, वे दुष्टोंपर प्रचण्ड कोप करनेवाले हैं, उनका हृदय विशाल है, वे सारे क्लेशोंको हर लेनेवाले अथवा सर्वसंहारी हैं, साधु पुरुषोंके प्रति उनका हृदय अत्यन्त उदार है, वे दिव्य धनुष और दो तरकश धारण करते हैं, उनका कवच सोनेका बना हुआ है तथा वे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ६४ ॥
पिनाकिनं वज्रिणं दीप्तशूलं परश्वधिं गदिनं चायतासिम् । शुभ्रं जटिलं मुसलिनं चन्द्रमौलिं व्याघ्राजिनं परिघिणं दण्डपाणिम् ॥ ६५ ॥ वे अपने हाथोंमें पिनाक और वज्र धारण करते हैं, उनके एक हाथमें त्रिशूल चमकता रहता है, वे फरसा, गदा और लंबी तलवार लिये रहते हैं, मुसल, परिघ और दण्ड भी उनके हाथोंकी शोभा बढ़ाते हैं, उनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है, वे मस्तकपर जटा और उसके ऊपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं, उनके श्रीअंगमें बाघम्बर शोभा देता है ॥ ६५ ॥
शुभाङ्गदं नागयज्ञोपवीतं विश्वैर्गणैः शोभितं भूतसंघैः । एकीभूतं तपसां संनिधानं