महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1560, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयति प्रभुम् । आत्मयोगाश्च तस्मिन् वै शास्त्रयोगाश्च शाश्वताः ॥ ९३ ॥ जो भगवान् शंकरको सर्वस्वरूप जानकर शिवलिंगमें उनकी पूजा करता है, उसमें सनातन आत्मयोग (आत्मा-परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) तथा शास्त्रयोग (स्वाध्यायजनित ज्ञान) प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ९३ ॥
एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्च परमर्षयः । प्रार्थयन्ते परं लोके स्थाणुमेकं स सर्वकृत् ॥ ९४ ॥ इस प्रकार आराधना करते हुए देवता, सिद्ध और महर्षिगण लोकमें एकमात्र सर्वोत्कृष्ट भगवान् शंकरसे ही अभीष्ट वस्तुकी प्रार्थना करते हैं; क्योंकि वे ही सब कुछ करनेवाले हैं ॥ ९४ ॥
स एष रुद्रभक्तश्च केशवो रुद्रसम्भवः । कृष्ण एव हि यष्टव्यो यज्ञैश्चैव सनातनः ॥ ९५ ॥ ये श्रीकृष्ण भगवान् शंकरके भक्त हैं और उन्हींसे प्रकट हुए हैं; अतः यज्ञोंद्वारा सनातनपुरुष श्रीकृष्णकी ही आराधना करनी चाहिये ॥ ९५ ॥
सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिङ्गमर्चति यः प्रभोः । तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वजः ॥ ९६ ॥ जो भगवान् शिवके लिंगको सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका स्थान जानकर उसकी पूजा करता है, उसपर भगवान् शंकर अधिक प्रेम करते हैं ॥ ९६ ॥
<div align="center">संजय उवाच</div>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्रोणपुत्रो महारथः । नमश्चकार रुद्राय बहु मेने च केशवम् ॥ ९७ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! व्यासजीकी यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामाने मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और श्रीकृष्णकी भी महत्ता स्वीकार कर ली ॥
हृष्टरोमा च वश्यात्मा सोऽभिवाद्य महर्षये । वरूथिनीमभिप्रेक्ष्य ह्यावहारमकारयत् ॥ ९८ ॥ उसके शरीरमें रोमांच हो आया। उसने विनीतभावसे महर्षिको प्रणाम किया और अपनी सेनाकी ओर देखकर उसे छावनीमें लौटनेकी आज्ञा दे दी ॥ ९८ ॥
ततः प्रत्यवहारोऽभूत् पाण्डवानां विशाम्पते । कौरवाणां च दीनानां द्रोणे युधि निपातिते ॥ ९९ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यके मारे जानेके बाद पाण्डवों तथा दीन कौरवोंकी सेनाएँ अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ॥ ९९ ॥
युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् ।