भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1563

तेन भग्नानरीन् सर्वान् मद्भग्नान् मन्यते जनः । तेन भग्नानि सैन्यानि पृष्ठतोऽनुव्रजाम्यहम् ।। ६ ।। उन्होंने ही मेरे समस्त शत्रुओंको मार भगाया है, किंतु लोग समझते हैं कि मैंने ही उन्हें मारा और भगाया है। शत्रुओंकी सारी सेनाएँ उन्हींके द्वारा नष्ट की गयीं, मैं तो केवल उनके पीछे-पीछे चलता था ।। ६ ।।

भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तमः । शूलपाणिर्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसंनिभः ।। ७ ।। भगवन्! मुझे बताइये, वे महापुरुष कौन थे? मैंने उन्हें हाथमें त्रिशूल लिये देखा था। वे सूर्यके समान तेजस्वी थे ।। ७ ।।

न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति । शूलाच्छूलसहस्राणि निष्पेतुस्तस्य तेजसा ।। ८ ।। वे अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श नहीं करते थे। त्रिशूलको अपने हाथसे अलग कभी नहीं छोड़ते थे। उनके तेजसे उस एक ही त्रिशूलसे सहस्रों नये-नये शूल प्रकट होकर शत्रुओंपर गिरते थे ।। ८ ।।

व्यास उवाच