भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1567, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1567

दुबले-पतले और भवसागरसे पार उतारनेवाले हैं, जो सूर्यस्वरूप, उत्तम तीर्थ और अत्यन्त वेगशाली हैं, उन देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है ।। ३०-३१ ।। बहुरूपाय सर्व्वाय प्रियाय प्रियवाससे। उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे ।। ३२ ।। जो अनेक रूप धारण करनेवाले, सर्वस्वरूप तथा सबके प्रिय हैं, वल्कल आदि वस्त्र जिन्हें प्रिय है, जो मस्तकपर पगड़ी धारण करते हैं, जिनका मुख सुन्दर है, जिनके सहस्रों नेत्र हैं तथा जो वर्षा करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ३२ ।। गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे। हिरण्यबाहवे राज्ञे उग्राय पतये दिशाम् ।। ३३ ।। जो पर्वतपर शयन करनेवाले, परम शान्त, यतिस्वरूप, चीरवस्त्रधारी, हिरण्यबाहु (सोनेके आभूषणोंसे विभूषित बाँहवाले), राजा (दीप्तिमान्), उग्र (भयंकर) तथा दिशाओंके अधिपति हैं, (उन भगवान् शंकरको नमस्कार है) ।। ३३ ।। पर्जन्यपतये चैव भूतानां पतये नमः। वृक्षाणां पतये चैव गवां च पतये नमः ।। ३४ ।। जो मेघोंके अधिपति तथा सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, उन्हें नमस्कार है। वृक्षोंके पालक और गौओंके अधिपतिरूप आपको नमस्कार है ।। ३४ ।। वृक्षैरावृतकायाय सेनान्ये मध्यमाय च। सुवहस्ताय देवाय धन्विने भार्गवाय च ।। ३५ ।। जिनका शरीर वृक्षोंसे आच्छादित है, जो सेनाके अधिपति और शरीरके मध्यवर्ती (अन्तर्यामी) हैं, यजमानरूपसे जो अपने हाथमें स्रुवा धारण करते हैं, जो दिव्यस्वरूप, धनुर्धर और भृगुवंशी परशुरामस्वरूप हैं, उनको नमस्कार है ।। ३५ ।। बहुरूपाय विश्वस्य पतये मुञ्जवाससे। सहस्रशिरसे चैव सहस्रनयनाय च ।। ३६ ।। सहस्रबाहवे चैव सहस्रचरणाय च। जिनके बहुत-से रूप हैं, जो इस विश्वके पालक होकर भी मूँजका कौपीन धारण करते हैं, जिनके सहस्रों सिर, सहस्रों नेत्र, सहस्रों भुजाएँ और सहस्रों पैर हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ३६१/२ ।। शरणं गच्छ कौन्तेय वरदं भुवनेश्वरम् ।। ३७ ।। उमापतिं विरूपाक्षं दक्षयज्ञनिबर्हणम्। प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम् ।। ३८ ।। कुन्तीनन्दन! तुम उन्हीं वरदायक भुवनेश्वर, उमा वल्लभ, त्रिनेत्रधारी, दक्षयज्ञविनाशक, प्रजापति, व्यग्रतारहित और अविनाशी भगवान् भूतनाथकी शरणमें जाओ ।। कपर्दिनं वृषावर्त्तं वृषनाभं वृषध्वजम्।