महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1569, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनमोऽस्तु त्रिपुरघ्नाय भगघ्नाय च वै नमः ।
वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नमः ।। ४७ ।।
त्रिपुरनाशक और भगनेत्रविनाशक भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है। वनस्पतियोंके पति तथा नरपतिरूप महादेवजीको नमस्कार है ।। ४७ ।।
मातृणां पतये चैव गणानां पतये नमः ।
गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नमः ।। ४८ ।।
मातृकाओंके अधिपति और गणोंके पालक शिवको नमस्कार है। गोपति और यज्ञपति शंकरको नित्य नमस्कार है ।। ४८ ।।
अपां च पतये नित्यं देवानां पतये नमः ।
पूष्णो दन्तविनाशाय त्र्यक्षाय वरदाय च ।। ४९ ।।
नीलकण्ठाय पिङ्गाय स्वर्णकेशाय वै नमः ।
जलपति तथा देवपतिको नित्य नमस्कार है। पूषाके दाँत तोड़नेवाले, त्रिनेत्रधारी वरदायक शिवको नमस्कार है। नीलकण्ठ, पिंगलवर्ण और सुनहरे केशवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है ।। ४९ १/२ ।।
कर्माणि यानि दिव्यानि महादेवस्य धीमतः ।। ५० ।।
तानि ते कीर्तयिष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
अर्जुन! अब मैं परम बुद्धिमान् महादेवजीके जो दिव्य कर्म हैं, उनका अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा मैंने सुन रखा है, वैसा ही तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ ।।
न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न राक्षसाः ।। ५१ ।।
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागताः ।
यदि वे कुपित हो जायँ तो देवता, असुर, गन्धर्व और राक्षस इस लोकमें अथवा पातालमें छिप जानेपर भी चैनसे नहीं रहने पाते हैं ।। ५१ १/२ ।।
दक्षस्य यजमानस्य विधिवत् सम्भृतं पुरा ।। ५२ ।।
विव्याध कुपितो यज्ञं निर्दयस्त्वभवत् तदा ।
धनुषा बाणमुत्सृज्य सघोषं विननाद च ।। ५३ ।।
पहलेकी बात है, वे यज्ञपरायण दक्षपर कुपित हो गये थे। उस समय उन्होंने उनके विधिपूर्वक किये जानेवाले यज्ञको नष्ट कर दिया था। उन दिनों वे निर्दय हो गये थे और धनुषद्वारा बाण छोड़कर बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे थे ।। ५२-५३ ।।
ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे स्म सुरास्तदा ।
विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे ।। ५४ ।।
देवताओंको उस समय कहीं भी सुख और शान्ति नहीं मिली, महेश्वरके कुपित होनेसे सहसा यज्ञमें उपद्रव खड़ा हो गया था ।। ५४ ।।
तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोकाः समाकुलाः ।