महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1571, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! सब देवता भयभीत हो भगवान् शंकरकी शरणमें आये। तब क्रोध शान्त होनेपर उन्होंने उस यज्ञको पूर्ण किया। उन दिनों देवता लोग भाग खड़े हुए थे, तभीसे आजतक वे देवता उनसे डरते रहते हैं ॥ ६२-६३ ॥ असुराणां पुराण्यासंत्रीणि वीर्यवतां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णं परमं महत् ॥ ६४ ॥ पूर्वकालमें परम पराक्रमी तीन असुरोंके आकाशमें तीन नगर थे। एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा अत्यन्त विशाल नगर सोनेका बना हुआ था ॥ ६४ ॥ सौवर्णं कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम् । तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युन्मालिन आयसम् ॥ ६५ ॥ उनमेंसे सोनेका नगर कमलाक्षके, चाँदीका तारकाक्षके तथा तीसरा लोहेका बना हुआ नगर विद्युन्मालीके अधिकारमें था ॥ ६५ ॥ न शक्तस्तानि मघवान् भेत्तुं सर्वायुधैरपि । अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मुः शरणमर्दिताः ॥ ६६ ॥ इन्द्र सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन नगरोंका भेदन न कर सके। तब उनसे पीड़ित हुए सम्पूर्ण देवता भगवान् शंकरकी शरणमें गये ॥ ६६ ॥ ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः । ब्रह्मदत्तवरा ह्येते घोरास्त्रिपुरवासिनः ॥ ६७ ॥ पीडयन्त्यधिकं लोकं यस्मात् ते वरदर्पिताः । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने महात्मा भगवान् शंकरसे कहा—‘प्रभो! ब्रह्माजीसे वरदान पाकर ये त्रिपुरनिवासी घोर दैत्य सम्पूर्ण जगत्को अधिकाधिक पीड़ा दे रहे हैं; क्योंकि वरदान प्राप्त होनेसे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है ॥ ६७ १/२ ॥ त्वदृते देवदेवेश नान्यः शक्तः कथंचन ॥ ६८ ॥ हन्तुं दैत्यान् महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विषः । ‘देवदेवेश्वर महादेव! आपके सिवा दूसरा कोई उन दैत्योंका वध करनेमें समर्थ नहीं है; अतः आप उन देवद्रोहियोंको मार डालिये ॥ ६८ १/२ ॥ रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशवः सर्वकर्मसु ॥ ६९ ॥ निपातयिष्यसे चैतानसुरान् भुवनेश्वर । ‘भुवनेश्वर! रुद्र! आप जब इन असुरोंका विनाश कर डालेंगे, तबसे सम्पूर्ण यज्ञकर्मोंमें जो पशु (यज्ञके साधनभूत उपकरण) होंगे, वे रुद्रके भाग समझे जायँगे’ ॥ स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा देवानां हितकाम्यया ॥ ७० ॥ गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हरः । पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शङ्करः ॥ ७१ ॥ अक्षं कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचनः ।