भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1572

चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कौ देवदेवः पिनाकधृक् ॥ ७२ ॥
अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च त्र्यम्बकः ।
यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम् ॥ ७३ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् शिवने ‘तथास्तु’ कहकर उनके हितकी इच्छासे गन्धमादन और विन्ध्याचल इन दो पर्वतोंको अपने रथके दो पार्श्ववर्ती ध्वज बनाये। फिर समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्‍वीको रथ बनाकर नागराज शेषको उस रथका धुरा बनाया। तत्पश्चात् त्रिनेत्रधारी पिनाकपाणि देवाधिदेव महादेवने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको रथके दो पहिये बनाये। एलपत्रके पुत्र और पुष्पदन्तको जूएकी कीलें बनाया। फिर त्र्यम्बकने मलयाचलको यूप और तक्षक नागको जूआ बाँधनेकी रस्सी बना लिया ॥ ७०—७३ ॥

योक्त्राङ्गानि च सत्त्वानि कृत्वा शर्वः प्रतापवान् ।
वेदान् कृत्वाऽथ चतुरश्चतुरश्वान् महेश्वरः ॥ ७४ ॥
इसी प्रकार प्रतापी भगवान् महेश्वरने अन्य प्राणियोंको जोते और बागडोर आदिके रूपमें रखकर चारों वेद ही रथके चार घोड़े बना लिये ॥ ७४ ॥

उपवेदान् खलीनांश्च कृत्वा लोकत्रयेश्वरः ।
गायत्रीं प्रग्रहं कृत्वा सावित्रीं च महेश्वरः ॥ ७५ ॥
तत्पश्चात् तीनों लोकोंके स्वामी महेश्वरने उपवेदोंको लगाम बनाकर गायत्री और सावित्रीको प्रग्रह बना लिया ॥ ७५ ॥

कृत्वोङ्कारं प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम् ।
गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम् ॥ ७६ ॥
विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च ।
वायुं कृत्वाथ वाजाभ्यां पुङ्खे वैवस्वतं यमम् ॥ ७७ ॥
फिर ओंकारको चाबुक, ब्रह्माजीको सारथि, मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकिनागको उसकी प्रत्यंचा, भगवान् विष्णुको उत्तम बाण, अग्निदेवको उस बाणका फल, वायुको उसके पंख और वैवस्वत यमको उसकी पूँछ बनाया ॥ ७६-७७ ॥

विद्युत् कृत्वाथ निश्राणं मेरुं कृत्वाथ वै ध्वजम् ।
आरुह्य स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिवः ॥ ७८ ॥
त्रिपुरस्य वधार्थाय स्थाणुः प्रहरतां वरः ।
असुराणामन्तकरः श्रीमानतुलविक्रमः ॥ ७९ ॥
बिजलीको उस बाणकी तीखी धार बनाकर मेरु पर्वतको प्रधान ध्वजके स्थानमें रखा। इस प्रकार सर्वदेवमय दिव्य रथ तैयार करके असुरोंका अन्त करनेवाले, अतुल पराक्रमी, योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा सदा स्थिर रहनेवाले श्रीमान् भगवान् शिव त्रिपुरवधके लिये उसपर आरूढ़ हुए ॥ ७८-७९ ॥