महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1573, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्तूयमानः सुरैः पार्थ ऋषिभिश्च तपोधनैः । स्थानं माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभुः ॥ ८० ॥ अतिष्ठत् स्थाणुभूतः स सहस्रं परिवत्सरान् । पार्थ! उस समय सम्पूर्ण देवता और तपोधन महर्षि भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे। उन भगवान्ने उस अनुपम एवं दिव्य माहेश्वर स्थान (रथ)-का निर्माण करके उसपर एक हजार वर्षोंतक स्थिरभावसे खड़े रहे ॥ ८० १/२ ॥
यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च ॥ ८१ ॥ त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । जब वे तीनों पुर आकाशमें एकत्र हुए, तब उन्होंने तीन गाँठ और तीन फलवाले बाणसे उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला ॥ ८१ १/२ ॥
पुराणि न च तं शेकुर्दानवाः प्रतिवीक्षितुम् ॥ ८२ ॥ शरं कालाग्निसंयुक्तं विष्णुसोमसमायुतम् । उस समय दानव उन नगरोंकी ओर और कालाग्निसे संयुक्त एवं विष्णु तथा सोमकी शक्तिसे सम्पन्न उस बाणकी ओर भी आँख उठाकर देख न सके ॥ ८२ १/२ ॥
पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवेक्षितुम् ॥ ८३ ॥ बालमङ्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुनः । जिस समय वे तीनों पुरोंको दग्ध कर रहे थे, उस समय पार्वतीदेवी भी उन्हें देखनेके लिये एक पाँच शिखावाले बालकको गोदमें लेकर वहाँ गयीं ॥ ८३ १/२ ॥
उमा जिज्ञासमाना वै कोऽयमित्यब्रवीत् सुरान् ॥ ८४ ॥ असूयतश्च शक्रस्य वज्रेण प्रहरिष्यतः । बाहुं सवज्रं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत् प्रभुः ॥ ८५ ॥ प्रहस्य भगवांस्तूर्णं सर्वलोकेश्वरो विभुः । पार्वतीदेवीने देवताओंसे पूछा—‘पहचानते हो, यह कौन है?’ उनके इस प्रश्नसे इन्द्रके हृदयमें असूया और क्रोधकी आग जल उठी, वे उस बालकपर वज्रका प्रहार करना ही चाहते थे कि सर्वलोकेश्वर सर्वव्यापी भगवान् शंकरने हँसकर उनकी वज्रसहित बाँहको स्तम्भित कर दिया ॥ ८४-८५ १/२ ॥
ततः स स्तम्भितभुजः शक्रो देवगणैर्वृतः ॥ ८६ ॥ जगाम ससुरस्तूर्णं ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम् । तदनन्तर स्तम्भित हुई भुजाके साथ ही देवताओंसहित इन्द्र तुरंत ही वहाँसे अविनाशी भगवान् ब्रह्माजीके पास गये ॥
ते तं प्रणम्य शिरसा प्रोचुः प्राञ्जलयस्तदा ॥ ८७ ॥ किमप्यङ्कगतं ब्रह्मन् पार्वत्या भूतमद्भुतम् ।