महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1574, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालरूपधरं दृष्ट्वा नास्माभिरभिलक्षितः ॥ ८८ ॥
देवताओंने मस्तक झुकाकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मन्! पार्वतीजीकी गोदमें बालरूपधारी एक अद्भुत प्राणी था, जिसे देखकर भी हमलोग पहचान नहीं सके हैं ।। ८७-८८ ।।
तस्मात् त्वां प्रष्टुमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम् ।
अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदराः ॥ ८९ ॥
‘अतः हमलोग आपसे उसके विषयमें पूछना चाहते हैं, उस बालकने बिना युद्धके ही खेल-खेलमें इन्द्रसहित हम देवताओंको परास्त कर दिया' ।। ८९ ।।
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्मविदां वरः ।
ध्यात्वा स शम्भुं भगवान् बालं चामिततेजसम् ॥ ९० ॥
उनकी यह बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् ब्रह्माने ध्यान करके अमिततेजस्वी बालरूपधारी शंकरको पहचान लिया ।। ९० ।।
उवाच भगवान् ब्रह्मा शक्रादींश्च सुरोत्तमान् ।
चराचरस्य जगतः प्रभुः स भगवान् हरः ॥ ९१ ॥
तस्मात् परतरं नान्यत् किंचिदस्ति महेश्वरात् ।
यो दृष्टो ह्युमया सार्धं युष्माभिरमितद्युतिः ॥ ९२ ॥
स पार्वत्याः कृते शर्वः कृतवान् बालरूपताम् ।
ते मया सहिता यूयं प्रापयध्वं तमेव हि ॥ ९३ ॥
तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उन देवश्रेष्ठ इन्द्र आदिसे कहा—'देवताओ! वे चराचर जगत्के स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर थे। उन महेश्वरसे बढ़कर दूसरी कोई सत्ता नहीं है। तुमलोगोंगे पार्वतीजीके साथ जिस अमिततेजस्वी बालकका दर्शन किया है, उसके रूपमें भगवान् शंकर ही थे। उन्होंने पार्वतीजीकी प्रसन्नताके लिये बालरूप धारण कर लिया था; अतः तुमलोग मेरे साथ उन्हींकी शरणमें चलो' ।। ९१—९३ ।।
स एष भगवान् देवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
न सम्बुबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम् ॥ ९४ ॥
सप्रजापतयः सर्वे बालार्कसदृशप्रभम् ।
उस बालकके रूपमें ये सर्वलोकेश्वर प्रभु भगवान् महादेव ही थे, किंतु प्रजापतियोंसहित सम्पूर्ण देवता बालसूर्यके सदृश कान्तिमान् उन जगदीश्वरको पहचान न सके ।। ९४ १/२ ।।
अथाभ्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्ट्वा स च महेश्वरम् ॥ ९५ ॥
अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामहः ।
तदनन्तर ब्रह्माजीने निकट जाकर भगवान् महेश्वरको देखा और ये ही सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा जानकर उनकी वन्दना की ।। ९५ १/२ ।।