महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1586, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
कर्णपर्व
प्रथमोऽध्यायः
कर्णवधका संक्षिप्त वृत्तान्त सुनकर जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे विस्तारपूर्वक कहनेका अनुरोध
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
‘अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।’
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणे हते राजन् दुर्योधनमुखा नृपाः ।
भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर दुर्योधन आदि राजाओंका मन अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। वे सब-के-सब द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास आये ॥ १ ॥
ते द्रोणमनुशोचन्तः कश्मलाभिहतौजसः ।
पर्युपासन्त शोकार्तास्ततः शारद्वतीसुतम् ॥ २ ॥
मोहवश उनका बल और उत्साह नष्ट-सा हो गया था। वे द्रोणाचार्यके लिये बारंबार चिन्ता करते हुए शोकसे व्याकुल हो कृपीकुमार अश्वत्थामाके पास उसके चारों ओर बैठ गये ॥ २ ॥
ते मुहूर्तं समाश्वस्य हेतुभिः शास्त्रसम्मितैः ।
रात्र्यागमे महीपालाः स्वानि वेश्मानि भेजिरे ॥ ३ ॥
वे शास्त्रानुकूल युक्तियोंद्वारा दो घड़ीतक अश्वत्थामाको सान्त्वना देते रहे। फिर रात हो जानेपर समस्त भूपाल अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥ ३ ॥
ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन् सुखम् ।
चिन्तयन्तः क्षयं तीव्रं दुःखशोकसमन्विताः ॥ ४ ॥