महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1701, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा संशप्तक-सेनाका संहार, श्रीकृष्णका अर्जुनको युद्धस्थलका दृश्य दिखाते हुए उनके पराक्रमकी प्रशंसा करना तथा पाण्ड्यनरेशका कौरव-सेनाके साथ युद्धारम्भ
संजय उवाच
प्रत्यागत्य पुनर्जिष्णुर्जघ्ने संशप्तकान् बहून् ।
वक्रातिवक्रगमनादङ्गारक इव ग्रहः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! जैसे मंगल नामक ग्रह वक्र और अतिचार गतिसे चलकर लोकके लिये अनिष्टकारी होता है, उसी प्रकार विजयशील अर्जुनने दण्डधारकी सेनासे पुनः लौटकर बहुत-से संशप्तकोंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥
पार्थबाणहता राजन् नराश्वरथकुञ्जराः ।
विचेलुर्भ्रमुर्नेशुः पेतुर्मम्लुश्च भारत ॥ २ ॥
भरतवंशी नरेश! अर्जुनके बाणोंसे आहत हो हाथी, घोड़े, रथ और पैदल मनुष्य विचलित, भ्रान्त, पतित, मलिन तथा नष्ट होने लगे ॥ २ ॥
धुर्यान् धुर्यगतान् सूतान् ध्वजांश्चापासिसायकान् ।
पाणीन् पाणिगतं शस्त्रं बाहूनपि शिरांसि च ॥ ३ ॥
भल्लैः क्षुरैरर्धचन्द्रैर्वत्सदन्तैश्च पाण्डवः ।
चिच्छेदमित्रवीराणां समरे प्रतियुध्यताम् ॥ ४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्ल, क्षुर, अर्धचन्द्र और वत्सदन्त नामक अस्त्रोंद्वारा समरांगणमें सामना करनेवाले विपक्षी वीरोंके रथोंमें जुते हुए धुरंधर अश्वों, सारथियों, ध्वजों, धनुषों, सायकों, तलवारों, हाथों, हाथमें रखे हुए शस्त्रों, भुजाओं तथा मस्तकोंको भी काट डाला ॥ ३-४ ॥
वासितार्थे युयुत्सन्तो वृषभा वृषभं यथा ।
निपतन्त्यर्जुनं शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५ ॥
जैसे मैथुनकी वासनावाली गायके लिये युद्धकी इच्छासे बहुतेरे साँड़ किसी एक साँड़पर टूट पड़ते हों, उसी प्रकार सैकड़ों और हजारों शूरवीर अर्जुनपर धावा बोलने लगे ॥ ५ ॥
तेषां तस्य च तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
त्रैलोक्यविजये यादृग् दैत्यानां सह वज्रिणा ॥ ६ ॥