महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1700, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चेदरक्षिष्य इमं जनं भयाद् द्विषद्भिरेवं बलिभिः प्रपीडितम् । तथा भविष्यद् विषतां प्रमोदनं यथा हतेष्वेविह नोऽरिसूदन ॥ २४ ॥ ‘शत्रुसूदन! यदि आप बलवान् शत्रुओंसे इस प्रकार पीड़ित हुए इन स्वजनोंकी भयसे रक्षा नहीं करते तो इन शत्रुओंको वैसी ही प्रसन्नता होती, जैसी इस समय इनके मारे जानेपर यहाँ हमलोगोंको हो रही है’ ॥ २४ ॥
इतीव भूयश्च सुहृद्भिरीरिता निशम्य वाचः सुमनास्ततोऽर्जुनः। यथानुरूपं प्रतिपूज्य तं जनं जगाम संशप्तकसंघहा पुनः ॥ २५ ॥ इस प्रकार अपने सुहृदोंकी कही हुई ये बातें बारंबार सुनकर अर्जुनको मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उन लोगोंका यथायोग्य आदर-सत्कार करके पुनः संशप्तकगणका वध करनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि दण्डवधेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें दण्डधार और दण्डका वधविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥