महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
न चेदरक्षिष्य इमं जनं भयाद् द्विषद्भिरेवं बलिभिः प्रपीडितम् । तथा भविष्यद् विषतां प्रमोदनं यथा हतेष्वेविह नोऽरिसूदन ॥ २४ ॥ ‘शत्रुसूदन! यदि आप बलवान् शत्रुओंसे इस प्रकार पीड़ित हुए इन स्वजनोंकी भयसे रक्षा नहीं करते तो इन शत्रुओंको वैसी ही प्रसन्नता होती, जैसी इस समय इनके मारे जानेपर यहाँ हमलोगोंको हो रही है’ ॥ २४ ॥
इतीव भूयश्च सुहृद्भिरीरिता निशम्य वाचः सुमनास्ततोऽर्जुनः। यथानुरूपं प्रतिपूज्य तं जनं जगाम संशप्तकसंघहा पुनः ॥ २५ ॥ इस प्रकार अपने सुहृदोंकी कही हुई ये बातें बारंबार सुनकर अर्जुनको मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उन लोगोंका यथायोग्य आदर-सत्कार करके पुनः संशप्तकगणका वध करनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि दण्डवधेऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें दण्डधार और दण्डका वधविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1701)
एकोनविंशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा संशप्तक-सेनाका संहार, श्रीकृष्णका अर्जुनको युद्धस्थलका दृश्य दिखाते हुए उनके पराक्रमकी प्रशंसा करना तथा पाण्ड्यनरेशका कौरव-सेनाके साथ युद्धारम्भ
संजय उवाच
प्रत्यागत्य पुनर्जिष्णुर्जघ्ने संशप्तकान् बहून् ।
वक्रातिवक्रगमनादङ्गारक इव ग्रहः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! जैसे मंगल नामक ग्रह वक्र और अतिचार गतिसे चलकर लोकके लिये अनिष्टकारी होता है, उसी प्रकार विजयशील अर्जुनने दण्डधारकी सेनासे पुनः लौटकर बहुत-से संशप्तकोंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ १ ॥
पार्थबाणहता राजन् नराश्वरथकुञ्जराः ।
विचेलुर्भ्रमुर्नेशुः पेतुर्मम्लुश्च भारत ॥ २ ॥
भरतवंशी नरेश! अर्जुनके बाणोंसे आहत हो हाथी, घोड़े, रथ और पैदल मनुष्य विचलित, भ्रान्त, पतित, मलिन तथा नष्ट होने लगे ॥ २ ॥
धुर्यान् धुर्यगतान् सूतान् ध्वजांश्चापासिसायकान् ।
पाणीन् पाणिगतं शस्त्रं बाहूनपि शिरांसि च ॥ ३ ॥
भल्लैः क्षुरैरर्धचन्द्रैर्वत्सदन्तैश्च पाण्डवः ।
चिच्छेदमित्रवीराणां समरे प्रतियुध्यताम् ॥ ४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्ल, क्षुर, अर्धचन्द्र और वत्सदन्त नामक अस्त्रोंद्वारा समरांगणमें सामना करनेवाले विपक्षी वीरोंके रथोंमें जुते हुए धुरंधर अश्वों, सारथियों, ध्वजों, धनुषों, सायकों, तलवारों, हाथों, हाथमें रखे हुए शस्त्रों, भुजाओं तथा मस्तकोंको भी काट डाला ॥ ३-४ ॥
वासितार्थे युयुत्सन्तो वृषभा वृषभं यथा ।
निपतन्त्यर्जुनं शूराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५ ॥
जैसे मैथुनकी वासनावाली गायके लिये युद्धकी इच्छासे बहुतेरे साँड़ किसी एक साँड़पर टूट पड़ते हों, उसी प्रकार सैकड़ों और हजारों शूरवीर अर्जुनपर धावा बोलने लगे ॥ ५ ॥
तेषां तस्य च तद् युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
त्रैलोक्यविजये यादृग् दैत्यानां सह वज्रिणा ॥ ६ ॥
उन योद्धाओं तथा अर्जुनका वह युद्ध वैसा ही रोमांचकारी था, जैसा कि त्रैलोक्य-विजयके समय वज्रधारी इन्द्रके साथ दैत्योंका हुआ था ॥ ६ ॥
तमविध्यत् त्रिभिर्बाणैर्दन्दशूकैरिवाहिभिः ।
उग्रायुधसुतस्तस्य शिरः कायादपाहरत् ॥ ७ ॥
उस समय उग्रायुधके पुत्रने अत्यन्त डँस लेनेके स्वभाववाले सर्पोंके समान तीन बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला। तब अर्जुनने उसके सिरको धड़से उतार लिया ॥ ७ ॥
तेऽर्जुनं सर्वतः क्रुद्धा नानाशस्त्रैरवीवृषन् ।
मरुद्भिः प्रेरिता मेघा हिमवन्तमिवोष्णगे ॥ ८ ॥
वे संशप्तक योद्धा कुपित हो अर्जुनपर सब ओरसे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, मानो वर्षाकालमें पवनप्रेरित मेघ हिमालयपर जलकी वृष्टि कर रहे हों ॥ ८ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य द्विषतां सर्वतोऽर्जुनः ।
सम्यगस्तैः शरैः सर्वानहितानहनद् बहून् ॥ ९ ॥
अर्जुनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका सब ओरसे निवारण करके अच्छी तरह चलाये हुए बाणोंद्वारा समस्त विपक्षियोंमेंसे बहुतोंको मार डाला ॥ ९ ॥
छिन्नत्रिवेणुसंघातान् हताश्वान् पार्ष्णिसारथीन् ।
विस्रस्तहस्ततूणीरान् विचक्ररथकेतनान् ॥ १० ॥
संछिन्नरश्मियोक्त्राक्षान् व्यनुकर्षयुगान् रथान् ।
विध्वस्तसर्वसंनाहान् बाणैश्चक्रेऽर्जुनस्तदा ॥ ११ ॥
अर्जुनने उस समय अपने बाणोंद्वारा शत्रुओंके रथोंकी बड़ी बुरी दशा कर डाली। उनके त्रिवेणुसमूह काट डाले, घोड़ों और पार्श्वोंरक्षकोंको मार डाला। उन योद्धाओंके हाथोंसे खिसककर तूणीर गिर गये तथा उनके रथोंके पहिये और ध्वज भी नष्ट हो गये। घोड़ोंकी बागडोर, जोत और रथके धुरे भी काट डाले गये। उनके अनुकर्ष और जूए भी चौपट हो गये थे ॥ १०-११ ॥
ते रथास्तत्र विध्वस्ताः परार्घ्या भान्त्यनेकशः ।
धनिनामिव वेश्मानि हतान्यग्न्यनिलाम्बुभिः ॥ १२ ॥
वे बहुमूल्य और बहुसंख्यक रथ, जो वहाँ टूट-फूटकर गिरे पड़े थे, आग, हवा और पानीसे नष्ट हुए धनवानोंके घरोंके समान जान पड़ते थे ॥ १२ ॥
द्विपाः सम्भिन्नवर्माणो वज्राशनिसमैः शरैः ।
पेतुर्गिर्यग्रवेश्मानि वज्रवाताग्निभिर्यथा ॥ १३ ॥
वज्र और बिजलीके समान तेजस्वी बाणोंसे कवच विदीर्ण हो जानेके कारण हाथी वज्र, वायु तथा आगसे नष्ट हुए पर्वत-शिखरोंपर बने हुए गृहोंके समान गिर पड़ते थे ॥ १३ ॥
सारोहास्तुरगाः पेतुर्बहवोऽर्जुनताडिताः ।
निर्जिह्वान्त्राः क्षितौ क्षीणा रुधिराद्राः सुदुर्दृशः ॥ १४ ॥ अर्जुनके मारे हुए बहुसंख्यक घोड़े और घुड़सवार पृथ्वीपर क्षत-विक्षत होकर पड़े थे। उनकी जीभ तथा आँतें बाहर निकल आयी थीं। वे खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन हो गया था ॥ १४ ॥ नराश्वनागा नाराचैः संस्यूताः सव्यसाचिना । बभ्रमुश्चस्खलुः पेतुर्नेदुर्मम्लुश्च मारिष ॥ १५ ॥ मान्यवर! सव्यसाची अर्जुनके नाराचोंसे गुथे हुए हाथी, घोड़े और मनुष्य चक्कर काटते, लड़खड़ाते, गिरते, चिल्लाते और मन मारकर रह जाते थे ॥ १५ ॥ अनेकैश्च शिलाधौतैर्वज्राशनिविषोपमैः । शरैर्निजघ्निवान् पार्थो महेन्द्र इव दानवान् ॥ १६ ॥ जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनने शिलापर तेज किये हुए वज्र, अशनि तथा विषके तुल्य अनेक भयंकर बाणोंद्वारा उन संशप्तक वीरोंका वध कर डाला ॥ १६ ॥ महार्हवर्माभरणा नानारूपाम्बरायुधाः । सरथाः सध्वजा वीरा हताः पार्थेन शेरते ॥ १७ ॥ अर्जुनद्वारा मारे गये संशप्तक वीर बहुमूल्य कवच, आभूषण, भाँति-भाँतिके वस्त्र, आयुध, रथ और ध्वजोंसहित रणभूमिमें सो रहे थे ॥ १७ ॥ विजिताः पुण्यकर्माणो विशिष्टाभिजनश्रुताः । गताः शरीरैर्वसुधामूर्जितैः कर्मभिर्दिवम् ॥ १८ ॥ वे पुण्यात्मा, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा विशिष्ट शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न वीर पराजित होकर अपने शरीरोंसे तो पृथ्वीपर गिरे, परंतु प्रबल उत्तम कर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकमें जा पहुँचे ॥ १८ ॥ अथार्जुनं रथवरं त्वदीयाः समभिद्रवन् । नानाजनपदाध्यक्षाः सगणा जातमन्यवः ॥ १९ ॥ तदनन्तर आपके सैनिक रथियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनपर टूट पड़े। वे विभिन्न जनपदोंके अधिपति थे और अपने दलबलके साथ कुपित होकर चढ़ आये थे ॥ १९ ॥ उह्यमाना रथाश्वेभैः पत्तयश्च जिघांसवः । समभ्यधावन्नस्यन्तो विविधं क्षिप्रमायुधम् ॥ २० ॥ रथों, घोड़ों और हाथियोंके सवार तथा पैदल सैनिक उन्हें मार डालनेकी इच्छासे नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए शीघ्रतापूर्वक धावा बोलने लगे ॥ २० ॥ तदायुधमहावर्षं मुक्तं योधमहाम्बुदैः । व्यधमन्निशितैर्बाणैः क्षिप्रमर्जुनमारुतः ॥ २१ ॥
परंतु अर्जुनरूपी वायुने संशप्तक सैनिकरूपी महामेघोंद्वारा की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी उस महावृष्टिको तीखे बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ २१ ॥
साश्वपत्तिद्विपस्थं महाशस्त्रौघसम्प्लवम् । सहसा संतितीर्षन्तं पार्थं शस्त्रास्त्रसेतुना ॥ २२ ॥ अथाब्रवीद् वासुदेवः पार्थ किं क्रीडसेऽनघ । संशप्तकान् प्रमथ्यैनांस्ततः कर्णवधे त्वर ॥ २३ ॥
अर्जुन हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसमूहोंसे युक्त तथा महान् अस्त्र-शस्त्रोंके प्रवाहसे परिपूर्ण उस सैन्य-समुद्रको अपने अस्त्र-शस्त्ररूपी पुलके द्वारा सहसा पार कर जाना चाहते थे। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘निष्पाप पार्थ! यह क्या खिलवाड़ कर रहे हो? इन संशप्तकोंका संहार करके कर्णके वधका शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो’ ॥ २२-२३ ॥
तथेत्युक्त्वार्जुनः कृष्णं शिष्टान् संशप्तकांस्तदा । आक्षिप्य शस्त्रेण बलाद् दैत्यानिन्द्र इवावधीत् ॥ २४ ॥
तब श्रीकृष्णसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अर्जुन दैत्योंका वध करनेवाले इन्द्रके समान उस समय शेष संशप्तक-सेनाको अस्त्र-शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न करके उसका बलपूर्वक विनाश करने लगे ॥ २४ ॥
आददत् संदधन्नेषून् दृष्टः कैश्चिद् रणेऽर्जुनः । विमुञ्चन् वा शरान् शीघ्रं दृश्यन्ते वै नरा हताः ॥ २५ ॥
उस समय रणभूमिमें किसीने यह नहीं देखा कि अर्जुन कब बाण लेते, कब उनका संधान करते अथवा कब उन्हें छोड़ते हैं? केवल उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक मारे गये मनुष्य ही दृष्टिगोचर होते थे ॥ २५ ॥
आश्चर्यमिति गोविन्दो ब्रुवन्नश्वानचोदयत् । हंसांशुगौरास्ते सेनां हंसाः सर इवाविशन् ॥ २६ ॥
‘आश्चर्य है’ ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंको आगे बढ़ाया। हंस तथा चन्द्र-किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले वे घोड़े शत्रुसेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस तालाबमें प्रवेश करते हैं ॥ २६ ॥
ततः संग्रामभूमिं च वर्तमाने जनक्षये । अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ २७ ॥
जब इस प्रकार जनसंहार होने लगा, उस समय रणभूमिकी ओर देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥
एष पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः । पृथिव्यां पार्थिवानां वै दुर्योधनकृते महान् ॥ २८ ॥
‘पार्थ! दुर्योधनके कारण यह भूमण्डलके भूपालों तथा भरतवंशियोंकी सेनाका महाभयंकर एवं महान् संहार हो रहा है ॥ २८ ॥
पश्य भारत चापानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् । महतां चापविद्धानि कलापानिषुधींस्तथा ॥ २९ ॥ ‘भरतनन्दन! देखो, बड़े-बड़े धनुर्धरोंके ये सुवर्णजटित पृष्ठभागवाले धनुष, आभूषण और तरकस पड़े हुए हैं ॥ २९ ॥
जातरूपमयैः पुङ्खैः शरांश्च नतपर्वणः । तैलधौतांश्च नाराचान् विमुक्तानिव पन्नगान् ॥ ३० ॥ ‘सुनहरी पाँखोंसे युक्त झुकी हुई गाँठवाले ये बाण तथा तेलमें धोकर साफ किये हुए नाराच धनुषसे छूटकर सर्पोंके समान पड़े हुए हैं, इनपर दृष्टिपात करो ॥ ३० ॥
आकीर्णांस्तोमरांश्चापि विचित्रान् हेमभूषितान् । चर्माणि चापविद्धानि रुक्मपृष्ठानि भारत ॥ ३१ ॥ ‘भारत! देखो, ये सुवर्णभूषित विचित्र तोमर चारों ओर बिखरे पड़े हैं और ये फेंकी हुई ढालें हैं, जिनके पृष्ठभागपर सोना जड़ा हुआ था ॥ ३१ ॥
सुवर्णविकृतान् प्रासाञ्शक्तीः कनकभूषिताः । जाम्बूनदमयैः पट्टैर्बद्धाश्च विपुला गदाः ॥ ३२ ॥ जातरूपमयीश्चर्ष्टीः पट्टिशान् हेमभूषितान् । दण्डैः कनकचित्रैश्च विप्रविद्धान् परश्वधान् ॥ ३३ ॥ ‘सोनेके बने हुए प्रास, सुवर्णभूषित शक्तियाँ, सोनेके पत्रोंसे जड़ी हुई विशाल गदाएँ, स्वर्णमयी ऋष्टि, सुवर्णभूषित पट्टिश तथा स्वर्णचित्रित दंडोंके साथ बहुत-से फरसे फेंके पड़े हैं, इनपर दृष्टिपात करो ॥ ३२-३३ ॥
परिघान् भिन्दिपालांश्च भुशुण्डीः कुणपानपि । अयस्कुन्तांश्च पतितान् मुसलानि गुरूणि च ॥ ३४ ॥ ‘देखो, ये परिघ, भिन्दिपाल, भुशुण्डी, कुणप, लोहेके बने हुए भाले तथा भारी-भारी मुसल पड़े हुए हैं ॥ ३४ ॥
नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जयगृद्धिनः । जीवन्त इव दृश्यन्ते गतसत्त्वास्तरस्विनः ॥ ३५ ॥ ‘विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वेगशाली वीर सैनिक हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्राणशून्य हो गये हैं तो भी जीवित-से दिखायी देते हैं ॥ ३५ ॥
गदाविमथितैर्गात्रैर्मुसलैर्भिन्नमस्तकान् । गजवाजिरथैः क्षुण्णान् पश्य योधान् सहस्रशः ॥ ३६ ॥ ‘देखो, ये सहस्रों योद्धा हाथी, घोड़ों और रथोंसे कुचल गये हैं। गदाओंके आघातसे इनके अंग चूर-चूर हो गये हैं और मुसलोंकी मारसे मस्तक फट गये हैं ॥ ३६ ॥
मनुष्यगजवाजीनां शरशक्त्यृष्टितोमरैः । निस्त्रिंशैः पट्टिशैः प्रासैर्नखरैर्लगुडैरपि ॥ ३७ ॥
शरीरैर्बहुधा छिन्नैः शोणितौघपरिप्लुतैः । गतासुभिरमित्रघ्न संवृता रणभूमयः ॥ ३८ ॥ 'शत्रुसूदन अर्जुन! बाण, शक्ति, ऋष्टि, तोमर, खड्ग, पट्टिश, प्रास, नखर और लगुडोंकी मारसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंके कई टुकड़े हो गये हैं। वे सब-के-सब खूनसे लथपथ हो प्राणशून्य होकर पड़े हैं और उनके द्वारा सारी रणभूमि पट गयी है ॥ ३७-३८ ॥
बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः साङ्गदैः शुभभूषणैः । सतलत्रैः सकेयूरैर्भाति भारत मेदिनी ॥ ३९ ॥ 'भारत! बाजूबंद और सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित, चन्दनसे चर्चित, दस्ताने और केयूरोंसे सुशोभित कटी भुजाओंद्वारा रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही है ॥ ३९ ॥
साङ्गुलित्रैर्भुजाग्रैश्च विप्रविद्धैरलंकृतैः । हस्तिहस्तोपमैश्छिन्नैरूरुभिश्च तरस्विनाम् ॥ ४० ॥ बद्धचूडामणिवरैः शिरोभिश्च सकुण्डलैः । 'अंगुलित्र और अलंकारोंसे अलंकृत हाथ फेंके पड़े हैं। वेगवान् वीरोंकी हाथीकी सूँड़के समान मोटी जाँघें कटकर गिरी हैं और जिनपर सुन्दर चूड़ामणि बँधी है वे योद्धाओंके कुण्डल-मण्डित मस्तक भी खण्डित होकर इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। उन सबसे रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही है ॥ ४० १/२ ॥
रथांश्च बहुधा भग्नान् हेमकिङ्किणिणः शुभान् ॥ ४१ ॥ अश्वांश्च बहुधा पश्य शोणितेन परिप्लुतान् । अनुकर्षानूपासङ्गान पताका विविधान् ध्वजान् ॥ ४२ ॥ योधानां च महाशङ्खान् पाण्डुरांश्च प्रकीर्णकान् । निरस्तजिह्वान् मातङ्गान् शयानान् पर्वतोपमान् ॥ ४३ ॥ 'देखो, सोनेकी छोटी-छोटी घंटियोंसे सुशोभित बहुसंख्यक रथोंके कितने ही टुकड़े हो गये हैं और नाना प्रकारके घोड़े लहूलुहान होकर पड़े हैं। अनुकर्ष, उपासंग, पताका, नाना प्रकारके ध्वज, योद्धाओंके सब ओर बिखरे हुए बड़े-बड़े श्वेत शंख तथा कितने ही पर्वताकार हाथी जीभ निकाले सोये पड़े हैं ॥ ४१—४३ ॥
वैजयन्तीर्विचित्राश्च हतांश्च गजयोधिनः । वारणानां परिस्तोमान् संयुक्तानेककम्बलान् ॥ ४४ ॥ 'कहीं विचित्र वैजयन्ती पताकाएँ पड़ी हैं, कहीं हाथी-सवार मरकर गिरे हैं और कहीं अनेक कम्बलोंसे युक्त हाथियोंके झूल बिखरे पड़े हैं। इनकी ओर दृष्टिपात करो ॥ ४४ ॥
विपाटितविचित्राश्च रूपचित्राः कुथास्तथा । भिन्नाश्च बहुधा घण्टाः पतद्भिश्चूर्णिता गजैः ॥ ४५ ॥
'हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कितने ही विचित्र कम्बल फट जानेके कारण विचित्र दशाको पहुँच गये हैं। कटकर गिरे हुए नाना प्रकारके घंटे गिरते हुए हाथियोंसे दबकर चूर-चूर हो गये हैं ।। ४५ ।।
वैदूर्यमणिदण्डांश्च पतितांश्चाङ्कुशान् भुवि ।
अश्वानां च युगापीडान् रत्नचित्रानुरश्छदान् ।। ४६ ।।
'देखो, वैदूर्यमणिके बने हुए दण्ड और अंकुश भूतलपर पड़े हैं, घोड़ोंके युगापीड तथा रत्नचित्रित कवच इधर-उधर गिरे हैं ।। ४६ ।।
विद्धाः सादिध्वजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कुथाः ।
विचित्रान् मणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् ।। ४७ ।।
अश्वास्तरपरिस्तोमान् राङ्कवान् पतितान् भुवि ।
'घुड़सवारोंकी ध्वजाओंके अग्रभागमें हाथियोंके सुनहरे कंबल उलझ गये हैं। घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले विचित्र, मणिजटित एवं सुवर्णभूषित रंकुमृगके चमड़ेके बने हुए झूल और जीन धरतीपर पड़े हैं, इन्हें देखो ।। ४७ १/२ ।।
चूडामणीन् नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः ।। ४८ ।।
छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ।
'राजाओंकी चूड़ामणियाँ, विचित्र स्वर्णमालाएँ, छत्र, चँवर और व्यजन फेंके पड़े हैं ।। ४८ १/२ ।।
चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। ४९ ।।
क्लृप्तश्मश्रुभिराकीर्णां पूर्णचन्द्रनिभैर्महीम् ।
'यहाँकी भूमि राजाओंके मनोहर कुण्डलयुक्त, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके समान कान्तिमान् एवं दाढ़ी-मूँछवाले पूर्ण चन्द्रतुल्य मुखोंसे ढक गयी है ।। ४९ १/२ ।।
कुमुदोत्पलपद्मानां खण्डैः फुल्लं यथा सरः ।। ५० ।।
तथा महीभृतां वक्त्रैः कुमुदोत्पलसंनिभैः ।
'जैसे तालाब कुमुद, उत्पल और कमलोंके समूहसे विकसित दिखायी देता है, उसी प्रकार राजाओंके कुमुद और उत्पल-सदृश मुखोंसे यह रणभूमि सुशोभित हो रही है ।। ५० १/२ ।।
तारागणविचित्रस्य निर्मलेन्दुद्युतित्विषः ।। ५१ ।।
पश्येमां नभसस्तुल्यां शरन्नक्षत्रमालिनीम् ।
'तारागणोंसे जिसकी विचित्र शोभा होती है तथा जहाँ निर्मल चन्द्रमाकी चाँदनी छिटकी रहती है, उस आकाशके समान इस रणभूमिकी शोभाको देखो। जान पड़ता है कि यह शरद्-ऋतुके नक्षत्रोंकी मालाओंसे अलंकृत है ।। ५१ १/२ ।।
एतत् तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे ।। ५२ ।।
दिवि वा देवराजस्य त्वया यत् कृतमाहवे ।
'अर्जुन! महासमरमें ऐसा पराक्रम, जो तूने किया है, या तो तुम्हारे ही योग्य है या स्वर्गमें देवराज इन्द्रके योग्य' ।। ५२ १/२ ।।
एवं तां दर्शयन् कृष्णो युद्धभूमिं किरीटिने ।। ५३ ।।
गच्छन्नेवाशृणोच्छब्दं दुर्योधनबले महत् ।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं भेरीपणवनिःस्वनम् ।। ५४ ।।
रथाश्वगजनादांश्च शस्त्रशब्दांश्च दारुणान् ।
इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनको उस युद्धभूमिका दर्शन कराते हुए श्रीकृष्णने जाते-जाते ही दुर्योधनकी सेनामें महान् कोलाहल सुना। वहाँ शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि छा रही थी। भेरी और पणव आदि बाजे बज रहे थे। रथके घोड़ों और हाथियोंके हींसने एवं चिग्घाड़नेके तथा शस्त्रोंके परस्पर टकरानेके भयानक शब्द भी सुनायी पड़ते थे ।। ५३-५४ १/२ ।।
प्रविश्य तद् बलं कृष्णस्तुरगैर्वातवेगितैः ।। ५५ ।।
पाण्ड्येनाभ्यर्दितं सैन्यं त्वदीयं वीक्ष्य विस्मितः ।
तब श्रीकृष्णने वायुके समान वेगशाली अश्वोंद्वारा उस सेनामें प्रवेश करके देखा कि पाण्ड्यनरेशने आपकी सेनाको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है; यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ५५ १/२ ।।
स हि नानाविधैर्बाणैरिष्वस्त्रप्रवरो युधि ।। ५६ ।।
न्यहनद् द्विषतां पूगान् गतासूनन्तको यथा ।
जैसे यमराज आयुरहित प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, उसी प्रकार धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य युद्धस्थलमें नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शत्रुसमूहोंका नाश कर रहे थे ।। ५६ १/२ ।।
गजवाजिमनुष्याणां शरीराणि शितैः शरैः ।। ५७ ।।
भित्त्वा प्रहरतां श्रेष्ठो विदेहासूनपातयत् ।
प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य अपने तीखे बाणोंसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उन्हें देह और प्राणोंसे शून्य एवं धराशायी कर देते थे ।। ५७ १/२ ।।
शत्रुप्रवीरैरस्त्राणि नानाशस्त्राणि सायकैः ।
छित्त्वा तानवधीच्छत्रून् पाण्ड्यः शक्र इवासुरान् ।। ५८ ।।
जैसे इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश शत्रुवीरोंद्वारा चलाये गये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको अपने बाणोंद्वारा नष्ट करके उन शत्रुओंका वध कर डालते थे ।। ५८ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः ।। १९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! तुमने पाण्ड्यको पहले ही लोकविख्यात वीर बतलाया था; परंतु संग्राममें उनके किये हुए वीरोचित कर्मका वर्णन नहीं किया ॥ १ ॥
विंशोऽध्यायः
अश्वत्थामाके द्वारा पाण्ड्यनरेशका वध
धृतराष्ट्र उवाच
प्रोक्तस्त्वया पूर्वमेव प्रवीरो लोकविश्रुतः ।
न त्वस्य कर्म संग्रामे त्वया संजय कीर्तितम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! तुमने पाण्ड्यको पहले ही लोकविख्यात वीर बतलाया था; परंतु संग्राममें उनके किये हुए वीरोचित कर्मका वर्णन नहीं किया ॥ १ ॥
तस्य विस्तरशो ब्रूहि प्रवीरस्याद्य विक्रमम् ।
शिक्षां प्रभावं वीर्यं च प्रमाणं दर्पमेव च ॥ २ ॥
आज उन प्रमुख वीरके पराक्रम, शिक्षा, प्रभाव, बल, प्रमाण और दर्पका विस्तारपूर्वक वर्णन करो ॥ २ ॥
संजय उवाच
भीष्मद्रोणकृपद्रौणिकर्णार्जुनजनार्दनान् ।
समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् मन्यसे रथान् ॥ ३ ॥
यो ह्याक्षिपति वीर्येण सर्वानैतान् महारथान् ।
न मेने चात्मना तुल्यं कंचिदेव नरेश्वरम् ॥ ४ ॥
तुल्यतां द्रोणभीष्माभ्यामात्मनो यो न मृष्यते ।
वासुदेवार्जुनाभ्यां च न्यूनतां नैच्छतात्मनि ॥ ५ ॥
स पाण्ड्यो नृपतिश्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
कर्णस्यानीकमहनत् पराभूत इवान्तकः ॥ ६ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण आदि जिन वीरोंको आप पूर्ण विद्वान्, धनुर्वेदमें श्रेष्ठ तथा महारथी मानते हैं, इन सब महारथियोंको जो अपने पराक्रमके समक्ष तुच्छ समझता था, जो किसी भी नरेशको अपने समान नहीं मानता था, जो द्रोण और भीष्मके साथ अपनी तुलना नहीं सह सकता था और जिसने श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे भी अपनेमें तनिक भी न्यूनता माननेकी इच्छा नहीं की, उसी सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ नृपशिरोमणि पाण्ड्यने अपमानित हुए यमराजके समान कुपित हो कर्णकी सेनाका वध आरम्भ किया ॥ ३—६ ॥
तदुदीर्णरथाश्वेभं पत्तिप्रवरसंकुलम् ।
कुलालचक्रवद् भ्रान्तं पाण्ड्येनाभ्याहतं बलात् ॥ ७ ॥
कौरव-सेनामें रथ, घोड़े और हाथियोंकी संख्या बढ़ी-चढ़ी थी, श्रेष्ठ पैदल सैनिकोंसे भी वह सेना भरी हुई थी, तथापि पाण्ड्यनरेशके द्वारा बलपूर्वक आहत होकर वह कुम्हारके चाककी भाँति चक्कर काटने लगी ॥ ७ ॥
व्यश्वसूतध्वजरथान् विप्रविद्धायुधद्विपान् । सम्यगस्तैः शरैः पाण्ड्यो वायुर्मेघानिवाक्षिपत् ॥ ८ ॥
जैसे वायु मेघोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने अच्छी तरह चलाये हुए बाणोंद्वारा समस्त सैनिकोंको घोड़े, सारथि, ध्वज और रथोंसे हीन कर दिया। उनके आयुधों और हाथियोंको भी मार गिराया ॥ ८ ॥
द्विरदान् द्विरदारोहान् विपताकायुधध्वजान् । सपादरक्षानहनद् वज्रेणाद्रीनिवाद्रिहा ॥ ९ ॥
जैसे पर्वतोंका हनन करनेवाले इन्द्रने वज्रद्वारा पर्वतोंपर आघात किया था, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने पादरक्षकोंसहित हाथियों और हाथीसवारोंको ध्वजा, पताका तथा आयुधोंसे वंचित करके मार डाला ॥ ९ ॥
सशक्तिप्रासतूणीरानश्वारोहान् हयानपि । पुलिन्दखसबाह्लीकनिषादान्ध्रककुन्तलान् ॥ १० ॥ दाक्षिणात्यांश्च भोजांश्च शूरान् संग्रामकर्कशान् । विशस्त्रकवचान् बाणैः कृत्वा चैवाकरोद् व्यसून् ॥ ११ ॥
शक्ति, प्रास और तरकसोंसहित घुड़सवारों तथा घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया। पुलिन्द, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्र, कुन्तल, दाक्षिणात्य तथा भोजप्रदेशीय रणकर्कश शूर-वीरोंको अपने बाणोंद्वारा अस्त्र-शस्त्र तथा कवचोंसे हीन करके उनके प्राण हर लिये ॥ १०-११ ॥
चतुरङ्गं बलं बाणैर्निघ्नन्तं पाण्ड्यमाहवे । दृष्ट्वा द्रौणिरसम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तस्ततोऽभ्ययात् ॥ १२ ॥
राजा पाण्ड्यको समरांगणमें बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका विनाश करते देख अश्वत्थामाने निर्भय होकर उनका सामना किया ॥ १२ ॥
आभाष्य चैनं मधुरमभीतं तमभीतवत् । प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वयत् ॥ १३ ॥
साथ ही उन निर्भय नरेशको मधुर वाणीमें सम्बोधित करके योद्धाओंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने मुसकराकर युद्धके लिये उनका आह्वान करते हुए निर्भीकके समान कहा — ॥ १३ ॥
राजन् कमलपत्राक्ष विशिष्टाभिजनश्रुत । वज्रसंहननप्रख्य प्रख्यातबलपौरुष ॥ १४ ॥
‘राजन्! कमलनयन! तुम्हारा कुल और शास्त्रज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। तुम्हारा सुगठित शरीर वज्रके समान कान्तिमान् है, तुम्हारे बल और पुरुषार्थ भी प्रसिद्ध हैं ॥ १४ ॥
मुष्टश्लिष्टायतज्यं च व्यायताभ्यां महत् धनुः ।
दोर्भ्यां विस्फारयन् भासि महाजलदवद् भृशम् ॥ १५ ॥
‘तुम्हारे धनुषकी प्रत्यंचा एक ही समय तुम्हारी मुट्ठीमें सटी हुई तथा गोलाकार फैली हुई दिखायी देती है। जब तुम अपनी दोनों बड़ी-बड़ी भुजाओंसे विशाल धनुषको खींचने और उसकी टंकार करने लगते हो, उस समय महान् मेघके समान तुम्हारी बड़ी शोभा होती है ॥ १५ ॥
शरवर्षैर्महावेगैरमित्रानभिवर्षतः ।
मदन्यं नानुपश्यामि प्रतिवीरं तवाहवे ॥ १६ ॥
‘जब तुम अपने शत्रुओंपर बड़े वेगसे बाण-वर्षा करने लगते हो, उस समय मैं अपने सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता, जो समरांगणमें तुम्हारा सामना कर सके ॥ १६ ॥
रथद्विरदपत्त्यश्वाननेकः प्रमथसे बहून् ।
मृगसंघानिवारण्ये विभिर्भीमबलो हरिः ॥ १७ ॥
तुम अकेले ही बहुत-से रथ, हाथी, पैदल और घोड़ोंको मथ डालते हो। ठीक उसी तरह जैसे वनमें भयंकर बलशाली सिंह बिना किसी भयके मृग-समूहोंका संहार कर डालता है ॥ १७ ॥
महता रथघोषेण दिवं भूमिं च नादयन् ।
वर्षान्ते सस्यहा मेघो भासि ह्रादीव पार्थिव ॥ १८ ॥
‘राजन्! तुम अपने रथके गम्भीर घोषसे आकाश और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए शरत्कालमें गर्जना करनेवाले सस्यनाशक मेघके समान जान पड़ते हो ॥ १८ ॥
संस्पृशानः शरांस्तीक्ष्णांस्तूणादाशीविषोपमान् ।
मयैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्बकेनान्धको यथा ॥ १९ ॥
‘अब तुम अपने तरकससे विषधर सर्पोंके समान तीखे बाण लेकर जैसे महादेवजीके साथ अन्धकासुरने संग्राम किया था, उसी प्रकार केवल मेरे साथ युद्ध करो' ॥ १९ ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा प्रहरेति च ताडितः ।
कर्णिना द्रोणतनयं विव्याध मलयध्वजः ॥ २० ॥
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर पाण्ड्यनरेश बोले—‘अच्छा ऐसा ही होगा। पहले तुम प्रहार करो।' इस प्रकार आक्षेपयुक्त वचन सुनकर अश्वत्थामाने उनपर अपने बाणका प्रहार किया। तब मलयध्वज पाण्ड्यनरेशने कर्णी नामक बाणके द्वारा द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ २० ॥
मर्मभेदिभिरत्युग्रैर्बाणैरग्निशिखोपमैः ।
स्मयन्नभ्यहनद् द्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यसत्तमः ॥ २१ ॥ तब आचार्यप्रवर अश्वत्थामाने अत्यन्त भयंकर तथा अग्निशिखाके समान तेजस्वी मर्मभेदी बाणोंद्वारा पाण्ड्यनरेशको मुसकराते हुए घायल कर दिया ॥ २१ ॥
ततोऽपरान् सुतीक्ष्णाग्रान् नाराचान् मर्मभेदिनः । गत्या दशम्या संयुक्तानश्वत्थामाप्यवासृजत् ॥ २२ ॥ तत्पश्चात् अश्वत्थामाने तीखे अग्रभागवाले दूसरे बहुत-से मर्मभेदी नाराच चलाये, जो दसवीं गतिका आश्रय लेकर छोड़े गये थे* ॥ २२ ॥
तान् शरानच्छिनत् पाण्ड्यो नवभिर्निशितैः शरैः । चतुर्भिर्दयच्चाश्वानाशु ते व्यसवोऽभवन् ॥ २३ ॥ परंतु पाण्ड्यनरेशने नौ तीखे सायकोंद्वारा उन सब बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर चार बाणोंसे उसके अश्वोंको अत्यन्त पीड़ा दी, जिससे वे शीघ्र ही अपने प्राण छोड़ बैठे ॥ २३ ॥
अथ द्रोणसुतस्येषूंस्ताञ्छित्त्वा निशितैः शरैः । धनुर्ज्यां विततां पाण्ड्यश्छिेदादित्य तेजसः ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् पाण्ड्यराजने अपने तीखे बाणोंद्वारा सूर्यके समान तेजस्वी अश्वत्थामाके उन बाणोंको छिन्न-भिन्न करके उसके धनुषकी फैली हुई डोरी भी काट डाली ॥ २४ ॥
दिव्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा । प्रेक्ष्य चाशु रथे युक्तान् नरैरन्यान् हयोत्तमान् ॥ २५ ॥ ततः शरसहस्राणि प्रेषयामास वै द्विजः । इषुसम्बाधमाकाशमकरोद् दिश एव च ॥ २६ ॥ तब शत्रुसूदन द्रोणपुत्र विप्रवर अश्वत्थामाने अपने दिव्य धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर तथा यह भी देखकर कि मेरे रथमें सेवकोंने शीघ्र ही दूसरे उत्तम घोड़े लाकर जोत दिये हैं, सहस्रों बाण छोड़े तथा आकाश और दिशाओंको अपने बाणोंसे खचाखच भर दिया ॥ २५-२६ ॥
ततस्तानस्यतः सर्वान् द्रौणेर्बाणान् महात्मनः । जानानोऽप्यक्षयान् पाण्ड्योऽशातयत् पुरुषर्षभः ॥ २७ ॥ पुरुषशिरोमणि पाण्ड्यने बाण चलाते हुए महामनस्वी अश्वत्थामाके उन सब बाणोंको अक्षय जानते हुए भी काट डाला ॥ २७ ॥
प्रयुक्तांस्तान् प्रयत्नेन छित्त्वा द्रौणेरिषूनरिः । चक्ररक्षौ रणे तस्य प्राणोदनिशितैः शरैः ॥ २८ ॥ इस प्रकार अश्वत्थामाके चलाये हुए उन बाणोंको प्रयत्नपूर्वक काटकर उसके शत्रु पाण्ड्यनरेशने पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें उसके दोनों चक्ररक्षकोंको मार डाला ॥ २८ ॥
अथारेर्लाघवं दृष्ट्वा मण्डलीकृतकार्मुकः । प्रास्यद् द्रोणसुतो बाणान् वृष्टिं पूषानुजो यथा ॥ २९ ॥
शत्रुकी यह फुर्ती देखकर द्रोणकुमारने अपने धनुषको खींचकर मण्डलाकार बना दिया और जैसे पूषाका भाई पर्जन्य जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार उसने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ २९ ॥
अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि यदायुधम् ।
अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ॥ ३० ॥
मान्यवर! आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़ोंने जितने आयुध ढोये थे, उन सबको अश्वत्थामाने उस दिनके आठवें भागमें चलाकर समाप्त कर दिया ॥ ३० ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धमन्तकस्यान्तकोपमम् ।
ये ये ददृशिरे तत्र विसंज्ञाः प्रायशोऽभवन् ॥ ३१ ॥
यमराजके समान क्रोधमें भरा हुआ अश्वत्थामा उस समय कालका भी काल-सा जान पड़ता था। जिन-जिन लोगोंने वहाँ उसे देखा, वे प्रायः बेहोश हो गये ॥ ३१ ॥
पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् ।
आचार्यपुत्रस्तां सेनां बाणवृष्ट्या व्यवीवृषत् ॥ ३२ ॥
जैसे वर्षाकालमें मेघ पर्वत और वृक्षोंसहित इस पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने उस सेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥
द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम् ।
वायव्यास्त्रेण संक्षिप्य मुदा पाण्ड्यानिलोऽनुदत् ॥ ३३ ॥
अश्वत्थामारूपी मेघद्वारा की हुई उस दुःसह बाण-वर्षाको पाण्ड्यराजरूपी वायुने वायव्यास्त्रसे छिन्न-भिन्न करके प्रसन्नतापूर्वक उड़ा दिया ॥ ३३ ॥
तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुरूषितम् ।
मलयप्रतिमं द्रौणिश्चित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ॥ ३४ ॥
उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामाने बारंबार गर्जना करते हुए पाण्ड्यके मलयाचल-सदृश ऊँचे तथा चन्दन और अगुरुसे चर्चित ध्वजको काटकर उनके चारों घोड़ोंको भी मार डाला ॥ ३४ ॥
सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिःस्वनम् ।
धनुश्छित्त्वार्धचन्द्रेण तिलशो व्यधमद् रथम् ॥ ३५ ॥
फिर एक बाणसे सारथिको मारकर महान् मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उनके धनुषको भी अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा काट दिया और उनके रथको तिल-तिल करके नष्ट कर डाला ॥ ३५ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य छित्त्वा सर्वायुधानि च ।
प्राप्तमप्यहितं द्रौणिर्न जघान रणेप्सया ॥ ३६ ॥
इस प्रकार अस्त्रोंद्वारा पाण्ड्यके अस्त्रोंका निवारण करके अश्वत्थामाने उनके सारे आयुध काट डाले, तथापि युद्धकी अभिलाषासे उसने अपने वशमें आये हुए शत्रु का भी वध
नहीं किया ।। ३६ ।। एतस्मिन्नन्तरे कर्णो गजानीकमुपादद्रवत् । द्रावयामास स तदा पाण्डवानां महद् बलम् ।। ३७ ।। इसी बीचमें कर्णने पाण्डवोंकी गजसेनापर आक्रमण किया। उस समय उसने पाण्डवोंकी विशाल सेनाको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ३७ ।। विरथान् रथिनश्चक्रे गजानश्वांश्च भारत । गजान् बहुभिरानर्च्छच्छरैः संनतपर्वभिः ।। ३८ ।। भारत! उसने बहुत-से रथियोंको रथहीन कर दिया, हाथीसवारों और घुड़सवारोंके हाथी और घोड़े मार डाले तथा झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा कितने ही हाथियोंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ।। ३८ ।। अथ द्रौणिर्महेष्वासः पाण्ड्यं शत्रुनिबर्हणम् । विरथं रथिनां श्रेष्ठं नाहनद् युद्धकाङ्क्षया ।। ३९ ।। इधर महाधनुर्धर अश्वत्थामाने शत्रुसंहारक, रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्यको रथहीन करके भी उनका वध इसलिये नहीं किया कि वह उनके साथ अभी युद्ध करना चाहता था ।। ३९ ।। हतेश्वरो दन्तिवरः सुकल्पित- स्त्वराभिसृष्टः प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद् द्रौणिशराहतस्त्वरन् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम् ।। ४० ।। इतनेहीमें एक सजा-सजाया श्रेष्ठ एवं बलवान् गजराज बड़ी उतावलीके साथ छूटकर प्रतिध्वनिका अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला, उसके मालिक और महावत मारे जा चुके थे। अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह शीघ्रतापूर्वक पाण्ड्यराजकी ओर दौड़ा। उसने प्रतिपक्षी हाथीकी गर्जनाका शब्द सुनकर बड़े वेगसे उसी ओर धावा किया था ।। ४० ।। तं वारणं वारणयुद्धकोविदो द्विपोत्तमं पर्वतसानुसंनिभम् । समभ्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वरन् यथाद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ।। ४१ ।। परंतु गजयुद्धविशारद मलयध्वज पाण्ड्यनरेश पर्वतशिखरके समान ऊँचे उस श्रेष्ठ गजराजपर उतनी ही शीघ्रताके साथ चढ़ गये, जैसे दहाड़ता हुआ सिंह किसी पहाड़ की चोटीपर चढ़ जाता है ।। ४१ ।। स तोमरं भास्कररश्मिवर्चसं बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः । ससर्ज शीघ्रं परिपीडयन् गजं
गुरोः सुतायाद्रिपतीश्वरो नदन् ।। ४२ ।। गिरिराज मलयके स्वामी पाण्ड्यराजने तुरंत अग्रसर होनेके लिये उस हाथीको पीड़ा दी और अस्त्र-प्रहारके लिये उत्तम यत्न, बल तथा क्रोधसे प्रेरित हो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक तोमर हाथमें लेकर गर्जना करते हुए उसे शीघ्र ही आचार्यपुत्रपर चला दिया ।। ४२ ।।
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै- रलंकृतं चांशुकमाल्यमौक्तिकैः । हतो हतोऽसीत्यसकृन्मुदा नदन् पराहनद् द्रौणिवराङ्गभूषणम् ।। ४३ ।। उस तोमरद्वारा उन्होंने उत्तम मणि, श्रेष्ठ हीरक, स्वर्ण, वस्त्र, माला और मुक्तासे विभूषित अश्वत्थामाके मुकुटपर बारंबार यह कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक आघात किया कि 'तुम मारे गये, मारे गये' ।। ४३ ।।
तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं भृशातिपातात् पतितं विचूर्णितम् । महेन्द्रवज्राभिहतं महास्वनं यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ।। ४४ ।। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और अग्निके समान प्रकाशमान वह मुकुट उस तोमरके गहरे आघातसे चूर-चूर होकर महान् शब्दके साथ उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो किसी पर्वतका शिखर भारी आवाजके साथ धराशायी हो जाता है ।। ४४ ।।
ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना पादाहतो नागपतिर्यथा तथा । समाददे चान्तकदण्डसंनिभा- निषूनमित्रार्तिकरांश्चतुर्दश ।। ४५ ।। तब अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए नागराजके समान शीघ्र ही अत्यन्त क्रोधसे जल उठा। फिर तो उसने यमदण्डके समान शत्रुओंको संताप देनेवाले चौदह बाण हाथमें लिये ।। ४५ ।।
द्विपस्य पादाग्रकरान् स पञ्चभि- र्नृपस्य बाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः । जघान षड्भिः षडनुत्तमत्विषः स पाण्ड्यराजानुचरान् महारथान् ।। ४६ ।। उसने पाँच बाणोंसे उस हाथीके पैर तथा सूँड़ काट लिये। फिर तीन बाणोंसे पाण्ड्यनरेशकी दोनों भुजाओं और मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया। इसके बाद छः
बाणोंसे पाण्ड्यराजके पीछे चलनेवाले उत्तम कान्तिसे सुशोभित छः महारथियोंको भी मार डाला ॥ ४६ ॥
सुदीर्घवृत्तौ वरचन्दनोक्षितौ सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषणौ । भुजौ धरायां पतितौ नृपस्य तौ विचेष्टतुस्तार्क्ष्यहताविवोरगौ ॥ ४७ ॥
उत्तम, विशाल, गोलाकार, श्रेष्ठ चन्दनसे चर्चित, सुवर्ण, मुक्ता, मणि तथा हीरोंसे विभूषित पाण्ड्यनरेशकी वे दोनों भुजाएँ पृथ्वीपर गिरकर गरुड़के मारे हुए दो सर्पोंके समान छटपटाने लगीं ॥ ४७ ॥
शिरश्च तत् पूर्णशशिप्रभाननं सरोषताम्रायतनेत्रमुन्नसम् । क्षितावपि भ्राजति तत् सकुण्डलं विशाखयोर्मध्यगतः शशी यथा ॥ ४८ ॥
जिसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके सदृश प्रकाशमान तथा नेत्र क्रोधके कारण अरुणवर्ण थे, जिसकी नासिका ऊँची थी, वह पाण्ड्यराजका कुण्डलमण्डित मस्तक पृथ्वीपर गिरकर भी दो विशाखा नक्षत्रोंके बीचमें विराजमान चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४८ ॥
स तु द्विपः पञ्चभिरुत्तमेषुभिः कृतः षडंशश्चतुरो नृपस्त्रिभिः । कृतो दशांशः कुशलेन युध्यता यथा हविस्तद्दशदैवतं तथा ॥ ४९ ॥
युद्धकुशल अश्वत्थामाने पाँच उत्तम बाण मारकर उस हाथीके छः टुकड़े कर दिये और फिर तीन बाणसे राजाके भी चार टुकड़े कर डाले। इस प्रकार दोनों मिलाकर दस भाग कर दिये। जैसे कि कर्मनिपुण पुरोहित दस हविर्धान यज्ञमें इन्द्र आदि दस देवताओंके लिये हविष्यके दस भाग कर देता है ॥ ४९ ॥
स पादशो राक्षसभोजनान् बहून् प्रदाय पाण्ड्योऽश्वमनुष्यकुञ्जरान् । स्वधामिवाप्य ज्वलनः पितृप्रिय- स्ततः प्रशान्तः सलिलप्रवाहतः ॥ ५० ॥
जैसे पितरोंकी प्रिय चिताग्नि मृत शरीरको पाकर प्रज्वलित हो उसे जलाती है और अन्तमें जलका अभिषेक पाकर शान्त हो जाती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश घोड़े, हाथी और मनुष्योंके टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें प्रचुर मात्रामें राक्षसोंके लिये भोजन देकर अन्तमें अश्वत्थामाके बाणसे सदाके लिये शान्त हो गये ॥ ५० ॥
समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः
समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः ।
सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजयन्मुदा
जिते बलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ॥ ५१ ॥
जिसने पूरी विद्या समाप्त कर ली है तथा समस्त कर्तव्यकर्म पूर्ण कर लिये हैं, उस गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पास सुहृदोंसहित आकर आपके पुत्र दुर्योधनने प्रसन्नतापूर्वक उसकी बड़ी पूजा की। ठीक उसी तरह जैसे बलिके पराजित होनेपर देवराज इन्द्रने विष्णुका पूजन किया था ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पाण्ड्यवधे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें पाण्ड्यवधविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
* बाणोंकी दस गतियाँ बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं—१-उन्मुखी, २-अभिमुखी, ३-तिर्यक्, ४-मन्दा, ५-गोमूत्रिका, ६-ध्रुवा, ७-स्खलिता, ८-यमकाक्रान्ता, ९-कृष्टा और १०-अतिकृष्टा। इनमेंसे पूर्वकी तीन गतियाँ क्रमशः मस्तक, हृदय तथा पार्श्वदेशका स्पर्श करनेवाली हैं। अर्थात् उन्मुखी गतिसे छोड़ा हुआ बाण मस्तकपर, अभिमुखी गतिसे प्रेरित बाण वक्षःस्थलपर और तिर्यक्-गतिसे चलाया हुआ बाण पार्श्वभागमें आघात करता है। मन्दा गतिसे छोड़े गये बाण त्वचाको कुछ-कुछ छेद पाते हैं। गोमूत्रिका गतिसे चलाये गये बाण बायें और दायें दोनों ओर जाते तथा कवचको भी काट देते हैं। ध्रुवा गति निश्चितरूपसे लक्ष्यका भेदन करानेवाली होती है। स्खलिता कहते हैं, लक्ष्यसे विचलित होनेवाली गतिको। उसके द्वारा संचालित बाण लक्ष्यभ्रष्ट होते हैं। यमकाक्रान्ता वह गति है, जिसके द्वारा प्रेरित बाण बारंबार लक्ष्य वेधकर निकल जाते हैं। कृष्टा उस गतिका नाम है, जो लक्ष्यके एक अवयव भुजा आदिका छेदन करती है। दसवीं गतिका नाम है अतिकृष्टा; जिसके द्वारा चलाया गया बाण शत्रुका मस्तक काटकर उसके साथ ही दूर जा गिरता है। (नीलकण्ठीके आधारपर)
अध्याय (पृष्ठ 1719)
एकविंशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-दलोंका भयंकर घमासान युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो युधि संजय ।
एकवीरेण कर्णेन द्रावितेषु परेषु च ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! जब युद्धस्थलमें अश्वत्थामाद्वारा पाण्ड्यनरेश मार डाले गये और मेरे पक्षके अद्वितीय वीर कर्णने जब शत्रुसैनिकोंको मार भगाया, उस समय अर्जुनने क्या किया? ॥ १ ॥
समाप्तविद्यो बलवान् युक्तो वीरः स पाण्डवः ।
सर्वभूतेष्वनुज्ञातः शङ्करेण महात्मना ॥ २ ॥
पाण्डुकुमार अर्जुन युद्धविद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके हैं। वे विजयके प्रयत्नमें लगे हुए बलवान् वीर हैं। भगवान् शंकरने उन्हें कृपापूर्वक अनुगृहीत करते हुए यह कह दिया है कि 'तुम समस्त प्राणियोंमें प्रधान एवं अजेय होओगे' ॥ २ ॥
तस्मान्महद् भयं तीव्रममित्रघ्नाद् धनंजयात् ।
स यत् तत्राकरोत् पार्थस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३ ॥
इसलिये उन शत्रुनाशक धनंजयसे मुझे अत्यन्त तीव्र एवं महान् भय बना रहता है। अतः संजय! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने जो कुछ किया हो, वह मुझे बताओ ॥ ३ ॥
संजय उवाच
हते पाण्ड्येऽर्जुनं कृष्णस्त्वरन्नाह वचो हितम् ।
पश्यामि नाहं राजानमपयातांश्च पाण्डवान् ॥ ४ ॥
संजयने कहा—राजन्! पाण्ड्यनरेशके मारे जानेपर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनसे यह हितकर वचन कहा—'पार्थ! मैं राजा युधिष्ठिरको नहीं देख रहा हूँ। युद्धस्थलसे हटे हुए अन्य पाण्डव भी मुझे नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ ४ ॥
निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् ।
अश्वत्थाम्नश्च सङ्कल्पाद्धताः कर्णेन सृञ्जयाः ॥ ५ ॥
तथाश्वरथनागानां कृतं च कदनं महत् ।
'पुनः लौटे हुए पाण्डव-योद्धाओंने विशाल शत्रुसेनामें भगदड़ मचा दी थी; परंतु अश्वत्थामाके संकल्पके अनुसार कर्णने सृंजयौंका संहार कर डाला तथा अपनी सेनाके हाथी, घोड़े एवं रथोंका भारी विनाश कर दिया' ॥ ५ १/२ ॥
सर्वमाख्यातवान् वीरो वासुदेवः किरीटिने ॥ ६ ॥