भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1715

नहीं किया ।। ३६ ।। एतस्मिन्नन्तरे कर्णो गजानीकमुपादद्रवत् । द्रावयामास स तदा पाण्डवानां महद् बलम् ।। ३७ ।। इसी बीचमें कर्णने पाण्डवोंकी गजसेनापर आक्रमण किया। उस समय उसने पाण्डवोंकी विशाल सेनाको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ३७ ।। विरथान् रथिनश्चक्रे गजानश्वांश्च भारत । गजान् बहुभिरानर्च्छच्छरैः संनतपर्वभिः ।। ३८ ।। भारत! उसने बहुत-से रथियोंको रथहीन कर दिया, हाथीसवारों और घुड़सवारोंके हाथी और घोड़े मार डाले तथा झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा कितने ही हाथियोंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ।। ३८ ।। अथ द्रौणिर्महेष्वासः पाण्ड्यं शत्रुनिबर्हणम् । विरथं रथिनां श्रेष्ठं नाहनद् युद्धकाङ्क्षया ।। ३९ ।। इधर महाधनुर्धर अश्वत्थामाने शत्रुसंहारक, रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्यको रथहीन करके भी उनका वध इसलिये नहीं किया कि वह उनके साथ अभी युद्ध करना चाहता था ।। ३९ ।। हतेश्वरो दन्तिवरः सुकल्पित- स्त्वराभिसृष्टः प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद् द्रौणिशराहतस्त्वरन् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम् ।। ४० ।। इतनेहीमें एक सजा-सजाया श्रेष्ठ एवं बलवान् गजराज बड़ी उतावलीके साथ छूटकर प्रतिध्वनिका अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला, उसके मालिक और महावत मारे जा चुके थे। अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह शीघ्रतापूर्वक पाण्ड्यराजकी ओर दौड़ा। उसने प्रतिपक्षी हाथीकी गर्जनाका शब्द सुनकर बड़े वेगसे उसी ओर धावा किया था ।। ४० ।। तं वारणं वारणयुद्धकोविदो द्विपोत्तमं पर्वतसानुसंनिभम् । समभ्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वरन् यथाद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ।। ४१ ।। परंतु गजयुद्धविशारद मलयध्वज पाण्ड्यनरेश पर्वतशिखरके समान ऊँचे उस श्रेष्ठ गजराजपर उतनी ही शीघ्रताके साथ चढ़ गये, जैसे दहाड़ता हुआ सिंह किसी पहाड़ की चोटीपर चढ़ जाता है ।। ४१ ।। स तोमरं भास्कररश्मिवर्चसं बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः । ससर्ज शीघ्रं परिपीडयन् गजं