महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1716, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरोः सुतायाद्रिपतीश्वरो नदन् ।। ४२ ।। गिरिराज मलयके स्वामी पाण्ड्यराजने तुरंत अग्रसर होनेके लिये उस हाथीको पीड़ा दी और अस्त्र-प्रहारके लिये उत्तम यत्न, बल तथा क्रोधसे प्रेरित हो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक तोमर हाथमें लेकर गर्जना करते हुए उसे शीघ्र ही आचार्यपुत्रपर चला दिया ।। ४२ ।।
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै- रलंकृतं चांशुकमाल्यमौक्तिकैः । हतो हतोऽसीत्यसकृन्मुदा नदन् पराहनद् द्रौणिवराङ्गभूषणम् ।। ४३ ।। उस तोमरद्वारा उन्होंने उत्तम मणि, श्रेष्ठ हीरक, स्वर्ण, वस्त्र, माला और मुक्तासे विभूषित अश्वत्थामाके मुकुटपर बारंबार यह कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक आघात किया कि 'तुम मारे गये, मारे गये' ।। ४३ ।।
तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं भृशातिपातात् पतितं विचूर्णितम् । महेन्द्रवज्राभिहतं महास्वनं यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ।। ४४ ।। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और अग्निके समान प्रकाशमान वह मुकुट उस तोमरके गहरे आघातसे चूर-चूर होकर महान् शब्दके साथ उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो किसी पर्वतका शिखर भारी आवाजके साथ धराशायी हो जाता है ।। ४४ ।।
ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना पादाहतो नागपतिर्यथा तथा । समाददे चान्तकदण्डसंनिभा- निषूनमित्रार्तिकरांश्चतुर्दश ।। ४५ ।। तब अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए नागराजके समान शीघ्र ही अत्यन्त क्रोधसे जल उठा। फिर तो उसने यमदण्डके समान शत्रुओंको संताप देनेवाले चौदह बाण हाथमें लिये ।। ४५ ।।
द्विपस्य पादाग्रकरान् स पञ्चभि- र्नृपस्य बाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः । जघान षड्भिः षडनुत्तमत्विषः स पाण्ड्यराजानुचरान् महारथान् ।। ४६ ।। उसने पाँच बाणोंसे उस हाथीके पैर तथा सूँड़ काट लिये। फिर तीन बाणोंसे पाण्ड्यनरेशकी दोनों भुजाओं और मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया। इसके बाद छः