महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1714, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुकी यह फुर्ती देखकर द्रोणकुमारने अपने धनुषको खींचकर मण्डलाकार बना दिया और जैसे पूषाका भाई पर्जन्य जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार उसने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ २९ ॥
अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि यदायुधम् ।
अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ॥ ३० ॥
मान्यवर! आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़ोंने जितने आयुध ढोये थे, उन सबको अश्वत्थामाने उस दिनके आठवें भागमें चलाकर समाप्त कर दिया ॥ ३० ॥
तमन्तकमिव क्रुद्धमन्तकस्यान्तकोपमम् ।
ये ये ददृशिरे तत्र विसंज्ञाः प्रायशोऽभवन् ॥ ३१ ॥
यमराजके समान क्रोधमें भरा हुआ अश्वत्थामा उस समय कालका भी काल-सा जान पड़ता था। जिन-जिन लोगोंने वहाँ उसे देखा, वे प्रायः बेहोश हो गये ॥ ३१ ॥
पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् ।
आचार्यपुत्रस्तां सेनां बाणवृष्ट्या व्यवीवृषत् ॥ ३२ ॥
जैसे वर्षाकालमें मेघ पर्वत और वृक्षोंसहित इस पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने उस सेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥
द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम् ।
वायव्यास्त्रेण संक्षिप्य मुदा पाण्ड्यानिलोऽनुदत् ॥ ३३ ॥
अश्वत्थामारूपी मेघद्वारा की हुई उस दुःसह बाण-वर्षाको पाण्ड्यराजरूपी वायुने वायव्यास्त्रसे छिन्न-भिन्न करके प्रसन्नतापूर्वक उड़ा दिया ॥ ३३ ॥
तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुरूषितम् ।
मलयप्रतिमं द्रौणिश्चित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ॥ ३४ ॥
उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामाने बारंबार गर्जना करते हुए पाण्ड्यके मलयाचल-सदृश ऊँचे तथा चन्दन और अगुरुसे चर्चित ध्वजको काटकर उनके चारों घोड़ोंको भी मार डाला ॥ ३४ ॥
सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिःस्वनम् ।
धनुश्छित्त्वार्धचन्द्रेण तिलशो व्यधमद् रथम् ॥ ३५ ॥
फिर एक बाणसे सारथिको मारकर महान् मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उनके धनुषको भी अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा काट दिया और उनके रथको तिल-तिल करके नष्ट कर डाला ॥ ३५ ॥
अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य छित्त्वा सर्वायुधानि च ।
प्राप्तमप्यहितं द्रौणिर्न जघान रणेप्सया ॥ ३६ ॥
इस प्रकार अस्त्रोंद्वारा पाण्ड्यके अस्त्रोंका निवारण करके अश्वत्थामाने उनके सारे आयुध काट डाले, तथापि युद्धकी अभिलाषासे उसने अपने वशमें आये हुए शत्रु का भी वध