महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1707, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कितने ही विचित्र कम्बल फट जानेके कारण विचित्र दशाको पहुँच गये हैं। कटकर गिरे हुए नाना प्रकारके घंटे गिरते हुए हाथियोंसे दबकर चूर-चूर हो गये हैं ।। ४५ ।।
वैदूर्यमणिदण्डांश्च पतितांश्चाङ्कुशान् भुवि ।
अश्वानां च युगापीडान् रत्नचित्रानुरश्छदान् ।। ४६ ।।
'देखो, वैदूर्यमणिके बने हुए दण्ड और अंकुश भूतलपर पड़े हैं, घोड़ोंके युगापीड तथा रत्नचित्रित कवच इधर-उधर गिरे हैं ।। ४६ ।।
विद्धाः सादिध्वजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कुथाः ।
विचित्रान् मणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् ।। ४७ ।।
अश्वास्तरपरिस्तोमान् राङ्कवान् पतितान् भुवि ।
'घुड़सवारोंकी ध्वजाओंके अग्रभागमें हाथियोंके सुनहरे कंबल उलझ गये हैं। घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले विचित्र, मणिजटित एवं सुवर्णभूषित रंकुमृगके चमड़ेके बने हुए झूल और जीन धरतीपर पड़े हैं, इन्हें देखो ।। ४७ १/२ ।।
चूडामणीन् नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः ।। ४८ ।।
छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ।
'राजाओंकी चूड़ामणियाँ, विचित्र स्वर्णमालाएँ, छत्र, चँवर और व्यजन फेंके पड़े हैं ।। ४८ १/२ ।।
चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। ४९ ।।
क्लृप्तश्मश्रुभिराकीर्णां पूर्णचन्द्रनिभैर्महीम् ।
'यहाँकी भूमि राजाओंके मनोहर कुण्डलयुक्त, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके समान कान्तिमान् एवं दाढ़ी-मूँछवाले पूर्ण चन्द्रतुल्य मुखोंसे ढक गयी है ।। ४९ १/२ ।।
कुमुदोत्पलपद्मानां खण्डैः फुल्लं यथा सरः ।। ५० ।।
तथा महीभृतां वक्त्रैः कुमुदोत्पलसंनिभैः ।
'जैसे तालाब कुमुद, उत्पल और कमलोंके समूहसे विकसित दिखायी देता है, उसी प्रकार राजाओंके कुमुद और उत्पल-सदृश मुखोंसे यह रणभूमि सुशोभित हो रही है ।। ५० १/२ ।।
तारागणविचित्रस्य निर्मलेन्दुद्युतित्विषः ।। ५१ ।।
पश्येमां नभसस्तुल्यां शरन्नक्षत्रमालिनीम् ।
'तारागणोंसे जिसकी विचित्र शोभा होती है तथा जहाँ निर्मल चन्द्रमाकी चाँदनी छिटकी रहती है, उस आकाशके समान इस रणभूमिकी शोभाको देखो। जान पड़ता है कि यह शरद्-ऋतुके नक्षत्रोंकी मालाओंसे अलंकृत है ।। ५१ १/२ ।।
एतत् तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे ।। ५२ ।।