भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1708

दिवि वा देवराजस्य त्वया यत् कृतमाहवे ।
'अर्जुन! महासमरमें ऐसा पराक्रम, जो तूने किया है, या तो तुम्हारे ही योग्य है या स्वर्गमें देवराज इन्द्रके योग्य' ।। ५२ १/२ ।।
एवं तां दर्शयन् कृष्णो युद्धभूमिं किरीटिने ।। ५३ ।।
गच्छन्नेवाशृणोच्छब्दं दुर्योधनबले महत् ।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं भेरीपणवनिःस्वनम् ।। ५४ ।।
रथाश्वगजनादांश्च शस्त्रशब्दांश्च दारुणान् ।
इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनको उस युद्धभूमिका दर्शन कराते हुए श्रीकृष्णने जाते-जाते ही दुर्योधनकी सेनामें महान् कोलाहल सुना। वहाँ शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि छा रही थी। भेरी और पणव आदि बाजे बज रहे थे। रथके घोड़ों और हाथियोंके हींसने एवं चिग्घाड़नेके तथा शस्त्रोंके परस्पर टकरानेके भयानक शब्द भी सुनायी पड़ते थे ।। ५३-५४ १/२ ।।
प्रविश्य तद् बलं कृष्णस्तुरगैर्वातवेगितैः ।। ५५ ।।
पाण्ड्येनाभ्यर्दितं सैन्यं त्वदीयं वीक्ष्य विस्मितः ।
तब श्रीकृष्णने वायुके समान वेगशाली अश्वोंद्वारा उस सेनामें प्रवेश करके देखा कि पाण्ड्यनरेशने आपकी सेनाको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है; यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ५५ १/२ ।।
स हि नानाविधैर्बाणैरिष्वस्त्रप्रवरो युधि ।। ५६ ।।
न्यहनद् द्विषतां पूगान् गतासूनन्तको यथा ।
जैसे यमराज आयुरहित प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, उसी प्रकार धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य युद्धस्थलमें नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शत्रुसमूहोंका नाश कर रहे थे ।। ५६ १/२ ।।
गजवाजिमनुष्याणां शरीराणि शितैः शरैः ।। ५७ ।।
भित्त्वा प्रहरतां श्रेष्ठो विदेहासूनपातयत् ।
प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य अपने तीखे बाणोंसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उन्हें देह और प्राणोंसे शून्य एवं धराशायी कर देते थे ।। ५७ १/२ ।।
शत्रुप्रवीरैरस्त्राणि नानाशस्त्राणि सायकैः ।
छित्त्वा तानवधीच्छत्रून् पाण्ड्यः शक्र इवासुरान् ।। ५८ ।।
जैसे इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश शत्रुवीरोंद्वारा चलाये गये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको अपने बाणोंद्वारा नष्ट करके उन शत्रुओंका वध कर डालते थे ।। ५८ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः ।। १९ ।।