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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

'हाथीकी पीठपर बिछाये जानेवाले कितने ही विचित्र कम्बल फट जानेके कारण विचित्र दशाको पहुँच गये हैं। कटकर गिरे हुए नाना प्रकारके घंटे गिरते हुए हाथियोंसे दबकर चूर-चूर हो गये हैं ।। ४५ ।।

वैदूर्यमणिदण्डांश्च पतितांश्चाङ्कुशान् भुवि ।
अश्वानां च युगापीडान् रत्नचित्रानुरश्छदान् ।। ४६ ।।
'देखो, वैदूर्यमणिके बने हुए दण्ड और अंकुश भूतलपर पड़े हैं, घोड़ोंके युगापीड तथा रत्नचित्रित कवच इधर-उधर गिरे हैं ।। ४६ ।।

विद्धाः सादिध्वजाग्रेषु सुवर्णविकृताः कुथाः ।
विचित्रान् मणिचित्रांश्च जातरूपपरिष्कृतान् ।। ४७ ।।
अश्वास्तरपरिस्तोमान् राङ्कवान् पतितान् भुवि ।
'घुड़सवारोंकी ध्वजाओंके अग्रभागमें हाथियोंके सुनहरे कंबल उलझ गये हैं। घोड़ोंकी पीठपर बिछाये जानेवाले विचित्र, मणिजटित एवं सुवर्णभूषित रंकुमृगके चमड़ेके बने हुए झूल और जीन धरतीपर पड़े हैं, इन्हें देखो ।। ४७ १/२ ।।

चूडामणीन् नरेन्द्राणां विचित्राः काञ्चनस्रजः ।। ४८ ।।
छत्राणि चापविद्धानि चामरव्यजनानि च ।
'राजाओंकी चूड़ामणियाँ, विचित्र स्वर्णमालाएँ, छत्र, चँवर और व्यजन फेंके पड़े हैं ।। ४८ १/२ ।।

चन्द्रनक्षत्रभासैश्च वदनैश्चारुकुण्डलैः ।। ४९ ।।
क्लृप्तश्मश्रुभिराकीर्णां पूर्णचन्द्रनिभैर्महीम् ।
'यहाँकी भूमि राजाओंके मनोहर कुण्डलयुक्त, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके समान कान्तिमान् एवं दाढ़ी-मूँछवाले पूर्ण चन्द्रतुल्य मुखोंसे ढक गयी है ।। ४९ १/२ ।।

कुमुदोत्पलपद्मानां खण्डैः फुल्लं यथा सरः ।। ५० ।।
तथा महीभृतां वक्त्रैः कुमुदोत्पलसंनिभैः ।
'जैसे तालाब कुमुद, उत्पल और कमलोंके समूहसे विकसित दिखायी देता है, उसी प्रकार राजाओंके कुमुद और उत्पल-सदृश मुखोंसे यह रणभूमि सुशोभित हो रही है ।। ५० १/२ ।।

तारागणविचित्रस्य निर्मलेन्दुद्युतित्विषः ।। ५१ ।।
पश्येमां नभसस्तुल्यां शरन्नक्षत्रमालिनीम् ।
'तारागणोंसे जिसकी विचित्र शोभा होती है तथा जहाँ निर्मल चन्द्रमाकी चाँदनी छिटकी रहती है, उस आकाशके समान इस रणभूमिकी शोभाको देखो। जान पड़ता है कि यह शरद्-ऋतुके नक्षत्रोंकी मालाओंसे अलंकृत है ।। ५१ १/२ ।।

एतत् तवैवानुरूपं कर्मार्जुन महाहवे ।। ५२ ।।

दिवि वा देवराजस्य त्वया यत् कृतमाहवे ।
'अर्जुन! महासमरमें ऐसा पराक्रम, जो तूने किया है, या तो तुम्हारे ही योग्य है या स्वर्गमें देवराज इन्द्रके योग्य' ।। ५२ १/२ ।।
एवं तां दर्शयन् कृष्णो युद्धभूमिं किरीटिने ।। ५३ ।।
गच्छन्नेवाशृणोच्छब्दं दुर्योधनबले महत् ।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं भेरीपणवनिःस्वनम् ।। ५४ ।।
रथाश्वगजनादांश्च शस्त्रशब्दांश्च दारुणान् ।
इस प्रकार किरीटधारी अर्जुनको उस युद्धभूमिका दर्शन कराते हुए श्रीकृष्णने जाते-जाते ही दुर्योधनकी सेनामें महान् कोलाहल सुना। वहाँ शंखों और दुन्दुभियोंकी ध्वनि छा रही थी। भेरी और पणव आदि बाजे बज रहे थे। रथके घोड़ों और हाथियोंके हींसने एवं चिग्घाड़नेके तथा शस्त्रोंके परस्पर टकरानेके भयानक शब्द भी सुनायी पड़ते थे ।। ५३-५४ १/२ ।।
प्रविश्य तद् बलं कृष्णस्तुरगैर्वातवेगितैः ।। ५५ ।।
पाण्ड्येनाभ्यर्दितं सैन्यं त्वदीयं वीक्ष्य विस्मितः ।
तब श्रीकृष्णने वायुके समान वेगशाली अश्वोंद्वारा उस सेनामें प्रवेश करके देखा कि पाण्ड्यनरेशने आपकी सेनाको अत्यन्त पीड़ित कर दिया है; यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ५५ १/२ ।।
स हि नानाविधैर्बाणैरिष्वस्त्रप्रवरो युधि ।। ५६ ।।
न्यहनद् द्विषतां पूगान् गतासूनन्तको यथा ।
जैसे यमराज आयुरहित प्राणियोंके प्राण हर लेते हैं, उसी प्रकार धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य युद्धस्थलमें नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शत्रुसमूहोंका नाश कर रहे थे ।। ५६ १/२ ।।
गजवाजिमनुष्याणां शरीराणि शितैः शरैः ।। ५७ ।।
भित्त्वा प्रहरतां श्रेष्ठो विदेहासूनपातयत् ।
प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ पाण्ड्य अपने तीखे बाणोंसे हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंको विदीर्ण करके उन्हें देह और प्राणोंसे शून्य एवं धराशायी कर देते थे ।। ५७ १/२ ।।
शत्रुप्रवीरैरस्त्राणि नानाशस्त्राणि सायकैः ।
छित्त्वा तानवधीच्छत्रून् पाण्ड्यः शक्र इवासुरान् ।। ५८ ।।
जैसे इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश शत्रुवीरोंद्वारा चलाये गये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको अपने बाणोंद्वारा नष्ट करके उन शत्रुओंका वध कर डालते थे ।। ५८ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकोनविंशोऽध्यायः ।। १९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! तुमने पाण्ड्यको पहले ही लोकविख्यात वीर बतलाया था; परंतु संग्राममें उनके किये हुए वीरोचित कर्मका वर्णन नहीं किया ॥ १ ॥

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विंशोऽध्यायः

अश्वत्थामाके द्वारा पाण्ड्यनरेशका वध

धृतराष्ट्र उवाच

प्रोक्तस्त्वया पूर्वमेव प्रवीरो लोकविश्रुतः ।
न त्वस्य कर्म संग्रामे त्वया संजय कीर्तितम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! तुमने पाण्ड्यको पहले ही लोकविख्यात वीर बतलाया था; परंतु संग्राममें उनके किये हुए वीरोचित कर्मका वर्णन नहीं किया ॥ १ ॥

तस्य विस्तरशो ब्रूहि प्रवीरस्याद्य विक्रमम् ।
शिक्षां प्रभावं वीर्यं च प्रमाणं दर्पमेव च ॥ २ ॥
आज उन प्रमुख वीरके पराक्रम, शिक्षा, प्रभाव, बल, प्रमाण और दर्पका विस्तारपूर्वक वर्णन करो ॥ २ ॥

संजय उवाच

भीष्मद्रोणकृपद्रौणिकर्णार्जुनजनार्दनान् ।
समाप्तविद्यान् धनुषि श्रेष्ठान् यान् मन्यसे रथान् ॥ ३ ॥
यो ह्याक्षिपति वीर्येण सर्वानैतान् महारथान् ।
न मेने चात्मना तुल्यं कंचिदेव नरेश्वरम् ॥ ४ ॥
तुल्यतां द्रोणभीष्माभ्यामात्मनो यो न मृष्यते ।
वासुदेवार्जुनाभ्यां च न्यूनतां नैच्छतात्मनि ॥ ५ ॥
स पाण्ड्यो नृपतिश्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
कर्णस्यानीकमहनत् पराभूत इवान्तकः ॥ ६ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण आदि जिन वीरोंको आप पूर्ण विद्वान्, धनुर्वेदमें श्रेष्ठ तथा महारथी मानते हैं, इन सब महारथियोंको जो अपने पराक्रमके समक्ष तुच्छ समझता था, जो किसी भी नरेशको अपने समान नहीं मानता था, जो द्रोण और भीष्मके साथ अपनी तुलना नहीं सह सकता था और जिसने श्रीकृष्ण तथा अर्जुनसे भी अपनेमें तनिक भी न्यूनता माननेकी इच्छा नहीं की, उसी सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ नृपशिरोमणि पाण्ड्यने अपमानित हुए यमराजके समान कुपित हो कर्णकी सेनाका वध आरम्भ किया ॥ ३—६ ॥

तदुदीर्णरथाश्वेभं पत्तिप्रवरसंकुलम् ।
कुलालचक्रवद् भ्रान्तं पाण्ड्येनाभ्याहतं बलात् ॥ ७ ॥

कौरव-सेनामें रथ, घोड़े और हाथियोंकी संख्या बढ़ी-चढ़ी थी, श्रेष्ठ पैदल सैनिकोंसे भी वह सेना भरी हुई थी, तथापि पाण्ड्यनरेशके द्वारा बलपूर्वक आहत होकर वह कुम्हारके चाककी भाँति चक्कर काटने लगी ॥ ७ ॥

व्यश्वसूतध्वजरथान् विप्रविद्धायुधद्विपान् । सम्यगस्तैः शरैः पाण्ड्यो वायुर्मेघानिवाक्षिपत् ॥ ८ ॥

जैसे वायु मेघोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने अच्छी तरह चलाये हुए बाणोंद्वारा समस्त सैनिकोंको घोड़े, सारथि, ध्वज और रथोंसे हीन कर दिया। उनके आयुधों और हाथियोंको भी मार गिराया ॥ ८ ॥

द्विरदान् द्विरदारोहान् विपताकायुधध्वजान् । सपादरक्षानहनद् वज्रेणाद्रीनिवाद्रिहा ॥ ९ ॥

जैसे पर्वतोंका हनन करनेवाले इन्द्रने वज्रद्वारा पर्वतोंपर आघात किया था, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेशने पादरक्षकोंसहित हाथियों और हाथीसवारोंको ध्वजा, पताका तथा आयुधोंसे वंचित करके मार डाला ॥ ९ ॥

सशक्तिप्रासतूणीरानश्वारोहान् हयानपि । पुलिन्दखसबाह्लीकनिषादान्ध्रककुन्तलान् ॥ १० ॥ दाक्षिणात्यांश्च भोजांश्च शूरान् संग्रामकर्कशान् । विशस्त्रकवचान् बाणैः कृत्वा चैवाकरोद् व्यसून् ॥ ११ ॥

शक्ति, प्रास और तरकसोंसहित घुड़सवारों तथा घोड़ोंको भी यमलोक पहुँचा दिया। पुलिन्द, खस, बाह्लीक, निषाद, आन्ध्र, कुन्तल, दाक्षिणात्य तथा भोजप्रदेशीय रणकर्कश शूर-वीरोंको अपने बाणोंद्वारा अस्त्र-शस्त्र तथा कवचोंसे हीन करके उनके प्राण हर लिये ॥ १०-११ ॥

चतुरङ्गं बलं बाणैर्निघ्नन्तं पाण्ड्यमाहवे । दृष्ट्वा द्रौणिरसम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तस्ततोऽभ्ययात् ॥ १२ ॥

राजा पाण्ड्यको समरांगणमें बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका विनाश करते देख अश्वत्थामाने निर्भय होकर उनका सामना किया ॥ १२ ॥

आभाष्य चैनं मधुरमभीतं तमभीतवत् । प्राह प्रहरतां श्रेष्ठः स्मितपूर्वं समाह्वयत् ॥ १३ ॥

साथ ही उन निर्भय नरेशको मधुर वाणीमें सम्बोधित करके योद्धाओंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने मुसकराकर युद्धके लिये उनका आह्वान करते हुए निर्भीकके समान कहा — ॥ १३ ॥

राजन् कमलपत्राक्ष विशिष्टाभिजनश्रुत । वज्रसंहननप्रख्य प्रख्यातबलपौरुष ॥ १४ ॥

‘राजन्! कमलनयन! तुम्हारा कुल और शास्त्रज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। तुम्हारा सुगठित शरीर वज्रके समान कान्तिमान् है, तुम्हारे बल और पुरुषार्थ भी प्रसिद्ध हैं ॥ १४ ॥
मुष्टश्लिष्टायतज्यं च व्यायताभ्यां महत् धनुः ।
दोर्भ्यां विस्फारयन् भासि महाजलदवद् भृशम् ॥ १५ ॥
‘तुम्हारे धनुषकी प्रत्यंचा एक ही समय तुम्हारी मुट्ठीमें सटी हुई तथा गोलाकार फैली हुई दिखायी देती है। जब तुम अपनी दोनों बड़ी-बड़ी भुजाओंसे विशाल धनुषको खींचने और उसकी टंकार करने लगते हो, उस समय महान् मेघके समान तुम्हारी बड़ी शोभा होती है ॥ १५ ॥
शरवर्षैर्महावेगैरमित्रानभिवर्षतः ।
मदन्यं नानुपश्यामि प्रतिवीरं तवाहवे ॥ १६ ॥
‘जब तुम अपने शत्रुओंपर बड़े वेगसे बाण-वर्षा करने लगते हो, उस समय मैं अपने सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता, जो समरांगणमें तुम्हारा सामना कर सके ॥ १६ ॥
रथद्विरदपत्त्यश्वाननेकः प्रमथसे बहून् ।
मृगसंघानिवारण्ये विभिर्भीमबलो हरिः ॥ १७ ॥
तुम अकेले ही बहुत-से रथ, हाथी, पैदल और घोड़ोंको मथ डालते हो। ठीक उसी तरह जैसे वनमें भयंकर बलशाली सिंह बिना किसी भयके मृग-समूहोंका संहार कर डालता है ॥ १७ ॥
महता रथघोषेण दिवं भूमिं च नादयन् ।
वर्षान्ते सस्यहा मेघो भासि ह्रादीव पार्थिव ॥ १८ ॥
‘राजन्! तुम अपने रथके गम्भीर घोषसे आकाश और पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए शरत्कालमें गर्जना करनेवाले सस्यनाशक मेघके समान जान पड़ते हो ॥ १८ ॥
संस्पृशानः शरांस्तीक्ष्णांस्तूणादाशीविषोपमान् ।
मयैवैकेन युध्यस्व त्र्यम्बकेनान्धको यथा ॥ १९ ॥
‘अब तुम अपने तरकससे विषधर सर्पोंके समान तीखे बाण लेकर जैसे महादेवजीके साथ अन्धकासुरने संग्राम किया था, उसी प्रकार केवल मेरे साथ युद्ध करो' ॥ १९ ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा प्रहरेति च ताडितः ।
कर्णिना द्रोणतनयं विव्याध मलयध्वजः ॥ २० ॥
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर पाण्ड्यनरेश बोले—‘अच्छा ऐसा ही होगा। पहले तुम प्रहार करो।' इस प्रकार आक्षेपयुक्त वचन सुनकर अश्वत्थामाने उनपर अपने बाणका प्रहार किया। तब मलयध्वज पाण्ड्यनरेशने कर्णी नामक बाणके द्वारा द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ २० ॥
मर्मभेदिभिरत्युग्रैर्बाणैरग्निशिखोपमैः ।

स्मयन्नभ्यहनद् द्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यसत्तमः ॥ २१ ॥ तब आचार्यप्रवर अश्वत्थामाने अत्यन्त भयंकर तथा अग्निशिखाके समान तेजस्वी मर्मभेदी बाणोंद्वारा पाण्ड्यनरेशको मुसकराते हुए घायल कर दिया ॥ २१ ॥

ततोऽपरान् सुतीक्ष्णाग्रान् नाराचान् मर्मभेदिनः । गत्या दशम्या संयुक्तानश्वत्थामाप्यवासृजत् ॥ २२ ॥ तत्पश्चात् अश्वत्थामाने तीखे अग्रभागवाले दूसरे बहुत-से मर्मभेदी नाराच चलाये, जो दसवीं गतिका आश्रय लेकर छोड़े गये थे* ॥ २२ ॥

तान् शरानच्छिनत् पाण्ड्यो नवभिर्निशितैः शरैः । चतुर्भिर्दयच्चाश्वानाशु ते व्यसवोऽभवन् ॥ २३ ॥ परंतु पाण्ड्यनरेशने नौ तीखे सायकोंद्वारा उन सब बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर चार बाणोंसे उसके अश्वोंको अत्यन्त पीड़ा दी, जिससे वे शीघ्र ही अपने प्राण छोड़ बैठे ॥ २३ ॥

अथ द्रोणसुतस्येषूंस्ताञ्छित्त्वा निशितैः शरैः । धनुर्ज्यां विततां पाण्ड्यश्छिेदादित्य तेजसः ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् पाण्ड्यराजने अपने तीखे बाणोंद्वारा सूर्यके समान तेजस्वी अश्वत्थामाके उन बाणोंको छिन्न-भिन्न करके उसके धनुषकी फैली हुई डोरी भी काट डाली ॥ २४ ॥

दिव्यं धनुरथाधिज्यं कृत्वा द्रौणिरमित्रहा । प्रेक्ष्य चाशु रथे युक्तान् नरैरन्यान् हयोत्तमान् ॥ २५ ॥ ततः शरसहस्राणि प्रेषयामास वै द्विजः । इषुसम्बाधमाकाशमकरोद् दिश एव च ॥ २६ ॥ तब शत्रुसूदन द्रोणपुत्र विप्रवर अश्वत्थामाने अपने दिव्य धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर तथा यह भी देखकर कि मेरे रथमें सेवकोंने शीघ्र ही दूसरे उत्तम घोड़े लाकर जोत दिये हैं, सहस्रों बाण छोड़े तथा आकाश और दिशाओंको अपने बाणोंसे खचाखच भर दिया ॥ २५-२६ ॥

ततस्तानस्यतः सर्वान् द्रौणेर्बाणान् महात्मनः । जानानोऽप्यक्षयान् पाण्ड्योऽशातयत् पुरुषर्षभः ॥ २७ ॥ पुरुषशिरोमणि पाण्ड्यने बाण चलाते हुए महामनस्वी अश्वत्थामाके उन सब बाणोंको अक्षय जानते हुए भी काट डाला ॥ २७ ॥

प्रयुक्तांस्तान् प्रयत्नेन छित्त्वा द्रौणेरिषूनरिः । चक्ररक्षौ रणे तस्य प्राणोदनिशितैः शरैः ॥ २८ ॥ इस प्रकार अश्वत्थामाके चलाये हुए उन बाणोंको प्रयत्नपूर्वक काटकर उसके शत्रु पाण्ड्यनरेशने पैने बाणोंद्वारा रणभूमिमें उसके दोनों चक्ररक्षकोंको मार डाला ॥ २८ ॥

अथारेर्लाघवं दृष्ट्वा मण्डलीकृतकार्मुकः । प्रास्यद् द्रोणसुतो बाणान् वृष्टिं पूषानुजो यथा ॥ २९ ॥

शत्रुकी यह फुर्ती देखकर द्रोणकुमारने अपने धनुषको खींचकर मण्डलाकार बना दिया और जैसे पूषाका भाई पर्जन्य जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार उसने बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ॥ २९ ॥

अष्टावष्टगवान्यूहुः शकटानि यदायुधम् ।
अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप मारिष ॥ ३० ॥
मान्यवर! आठ बैलोंसे जुते हुए आठ छकड़ोंने जितने आयुध ढोये थे, उन सबको अश्वत्थामाने उस दिनके आठवें भागमें चलाकर समाप्त कर दिया ॥ ३० ॥

तमन्तकमिव क्रुद्धमन्तकस्यान्तकोपमम् ।
ये ये ददृशिरे तत्र विसंज्ञाः प्रायशोऽभवन् ॥ ३१ ॥
यमराजके समान क्रोधमें भरा हुआ अश्वत्थामा उस समय कालका भी काल-सा जान पड़ता था। जिन-जिन लोगोंने वहाँ उसे देखा, वे प्रायः बेहोश हो गये ॥ ३१ ॥

पर्जन्य इव घर्मान्ते वृष्ट्या साद्रिद्रुमां महीम् ।
आचार्यपुत्रस्तां सेनां बाणवृष्ट्या व्यवीवृषत् ॥ ३२ ॥
जैसे वर्षाकालमें मेघ पर्वत और वृक्षोंसहित इस पृथ्वीपर जलकी वर्षा करता है, उसी प्रकार आचार्यपुत्र अश्वत्थामाने उस सेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३२ ॥

द्रौणिपर्जन्यमुक्तां तां बाणवृष्टिं सुदुःसहाम् ।
वायव्यास्त्रेण संक्षिप्य मुदा पाण्ड्यानिलोऽनुदत् ॥ ३३ ॥
अश्वत्थामारूपी मेघद्वारा की हुई उस दुःसह बाण-वर्षाको पाण्ड्यराजरूपी वायुने वायव्यास्त्रसे छिन्न-भिन्न करके प्रसन्नतापूर्वक उड़ा दिया ॥ ३३ ॥

तस्य नानदतः केतुं चन्दनागुरुरूषितम् ।
मलयप्रतिमं द्रौणिश्चित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ॥ ३४ ॥
उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामाने बारंबार गर्जना करते हुए पाण्ड्यके मलयाचल-सदृश ऊँचे तथा चन्दन और अगुरुसे चर्चित ध्वजको काटकर उनके चारों घोड़ोंको भी मार डाला ॥ ३४ ॥

सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिःस्वनम् ।
धनुश्छित्त्वार्धचन्द्रेण तिलशो व्यधमद् रथम् ॥ ३५ ॥
फिर एक बाणसे सारथिको मारकर महान् मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उनके धनुषको भी अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा काट दिया और उनके रथको तिल-तिल करके नष्ट कर डाला ॥ ३५ ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य छित्त्वा सर्वायुधानि च ।
प्राप्तमप्यहितं द्रौणिर्न जघान रणेप्सया ॥ ३६ ॥
इस प्रकार अस्त्रोंद्वारा पाण्ड्यके अस्त्रोंका निवारण करके अश्वत्थामाने उनके सारे आयुध काट डाले, तथापि युद्धकी अभिलाषासे उसने अपने वशमें आये हुए शत्रु का भी वध

नहीं किया ।। ३६ ।। एतस्मिन्नन्तरे कर्णो गजानीकमुपादद्रवत् । द्रावयामास स तदा पाण्डवानां महद् बलम् ।। ३७ ।। इसी बीचमें कर्णने पाण्डवोंकी गजसेनापर आक्रमण किया। उस समय उसने पाण्डवोंकी विशाल सेनाको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ३७ ।। विरथान् रथिनश्चक्रे गजानश्वांश्च भारत । गजान् बहुभिरानर्च्छच्छरैः संनतपर्वभिः ।। ३८ ।। भारत! उसने बहुत-से रथियोंको रथहीन कर दिया, हाथीसवारों और घुड़सवारोंके हाथी और घोड़े मार डाले तथा झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा कितने ही हाथियोंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ।। ३८ ।। अथ द्रौणिर्महेष्वासः पाण्ड्यं शत्रुनिबर्हणम् । विरथं रथिनां श्रेष्ठं नाहनद् युद्धकाङ्क्षया ।। ३९ ।। इधर महाधनुर्धर अश्वत्थामाने शत्रुसंहारक, रथियोंमें श्रेष्ठ पाण्ड्यको रथहीन करके भी उनका वध इसलिये नहीं किया कि वह उनके साथ अभी युद्ध करना चाहता था ।। ३९ ।। हतेश्वरो दन्तिवरः सुकल्पित- स्त्वराभिसृष्टः प्रतिशब्दगो बली । तमाद्रवद् द्रौणिशराहतस्त्वरन् जवेन कृत्वा प्रतिहस्तिगर्जितम् ।। ४० ।। इतनेहीमें एक सजा-सजाया श्रेष्ठ एवं बलवान् गजराज बड़ी उतावलीके साथ छूटकर प्रतिध्वनिका अनुसरण करता हुआ उधर आ निकला, उसके मालिक और महावत मारे जा चुके थे। अश्वत्थामाके बाणोंसे आहत होकर वह शीघ्रतापूर्वक पाण्ड्यराजकी ओर दौड़ा। उसने प्रतिपक्षी हाथीकी गर्जनाका शब्द सुनकर बड़े वेगसे उसी ओर धावा किया था ।। ४० ।। तं वारणं वारणयुद्धकोविदो द्विपोत्तमं पर्वतसानुसंनिभम् । समभ्यतिष्ठन्मलयध्वजस्त्वरन् यथाद्रिशृङ्गं हरिरुन्नदंस्तथा ।। ४१ ।। परंतु गजयुद्धविशारद मलयध्वज पाण्ड्यनरेश पर्वतशिखरके समान ऊँचे उस श्रेष्ठ गजराजपर उतनी ही शीघ्रताके साथ चढ़ गये, जैसे दहाड़ता हुआ सिंह किसी पहाड़ की चोटीपर चढ़ जाता है ।। ४१ ।। स तोमरं भास्कररश्मिवर्चसं बलास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः । ससर्ज शीघ्रं परिपीडयन् गजं

गुरोः सुतायाद्रिपतीश्वरो नदन् ।। ४२ ।। गिरिराज मलयके स्वामी पाण्ड्यराजने तुरंत अग्रसर होनेके लिये उस हाथीको पीड़ा दी और अस्त्र-प्रहारके लिये उत्तम यत्न, बल तथा क्रोधसे प्रेरित हो सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी एक तोमर हाथमें लेकर गर्जना करते हुए उसे शीघ्र ही आचार्यपुत्रपर चला दिया ।। ४२ ।।

मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै- रलंकृतं चांशुकमाल्यमौक्तिकैः । हतो हतोऽसीत्यसकृन्मुदा नदन् पराहनद् द्रौणिवराङ्गभूषणम् ।। ४३ ।। उस तोमरद्वारा उन्होंने उत्तम मणि, श्रेष्ठ हीरक, स्वर्ण, वस्त्र, माला और मुक्तासे विभूषित अश्वत्थामाके मुकुटपर बारंबार यह कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक आघात किया कि 'तुम मारे गये, मारे गये' ।। ४३ ।।

तदर्कचन्द्रग्रहपावकत्विषं भृशातिपातात् पतितं विचूर्णितम् । महेन्द्रवज्राभिहतं महास्वनं यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ।। ४४ ।। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और अग्निके समान प्रकाशमान वह मुकुट उस तोमरके गहरे आघातसे चूर-चूर होकर महान् शब्दके साथ उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे आहत हो किसी पर्वतका शिखर भारी आवाजके साथ धराशायी हो जाता है ।। ४४ ।।

ततः प्रजज्वाल परेण मन्युना पादाहतो नागपतिर्यथा तथा । समाददे चान्तकदण्डसंनिभा- निषूनमित्रार्तिकरांश्चतुर्दश ।। ४५ ।। तब अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए नागराजके समान शीघ्र ही अत्यन्त क्रोधसे जल उठा। फिर तो उसने यमदण्डके समान शत्रुओंको संताप देनेवाले चौदह बाण हाथमें लिये ।। ४५ ।।

द्विपस्य पादाग्रकरान् स पञ्चभि- र्नृपस्य बाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः । जघान षड्भिः षडनुत्तमत्विषः स पाण्ड्यराजानुचरान् महारथान् ।। ४६ ।। उसने पाँच बाणोंसे उस हाथीके पैर तथा सूँड़ काट लिये। फिर तीन बाणोंसे पाण्ड्यनरेशकी दोनों भुजाओं और मस्तकको शरीरसे अलग कर दिया। इसके बाद छः

बाणोंसे पाण्ड्यराजके पीछे चलनेवाले उत्तम कान्तिसे सुशोभित छः महारथियोंको भी मार डाला ॥ ४६ ॥

सुदीर्घवृत्तौ वरचन्दनोक्षितौ सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषणौ । भुजौ धरायां पतितौ नृपस्य तौ विचेष्टतुस्तार्क्ष्यहताविवोरगौ ॥ ४७ ॥

उत्तम, विशाल, गोलाकार, श्रेष्ठ चन्दनसे चर्चित, सुवर्ण, मुक्ता, मणि तथा हीरोंसे विभूषित पाण्ड्यनरेशकी वे दोनों भुजाएँ पृथ्वीपर गिरकर गरुड़के मारे हुए दो सर्पोंके समान छटपटाने लगीं ॥ ४७ ॥

शिरश्च तत् पूर्णशशिप्रभाननं सरोषताम्रायतनेत्रमुन्नसम् । क्षितावपि भ्राजति तत् सकुण्डलं विशाखयोर्मध्यगतः शशी यथा ॥ ४८ ॥

जिसका मुखमण्डल पूर्ण चन्द्रमाके सदृश प्रकाशमान तथा नेत्र क्रोधके कारण अरुणवर्ण थे, जिसकी नासिका ऊँची थी, वह पाण्ड्यराजका कुण्डलमण्डित मस्तक पृथ्वीपर गिरकर भी दो विशाखा नक्षत्रोंके बीचमें विराजमान चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ४८ ॥

स तु द्विपः पञ्चभिरुत्तमेषुभिः कृतः षडंशश्चतुरो नृपस्त्रिभिः । कृतो दशांशः कुशलेन युध्यता यथा हविस्तद्दशदैवतं तथा ॥ ४९ ॥

युद्धकुशल अश्वत्थामाने पाँच उत्तम बाण मारकर उस हाथीके छः टुकड़े कर दिये और फिर तीन बाणसे राजाके भी चार टुकड़े कर डाले। इस प्रकार दोनों मिलाकर दस भाग कर दिये। जैसे कि कर्मनिपुण पुरोहित दस हविर्धान यज्ञमें इन्द्र आदि दस देवताओंके लिये हविष्यके दस भाग कर देता है ॥ ४९ ॥

स पादशो राक्षसभोजनान् बहून् प्रदाय पाण्ड्योऽश्वमनुष्यकुञ्जरान् । स्वधामिवाप्य ज्वलनः पितृप्रिय- स्ततः प्रशान्तः सलिलप्रवाहतः ॥ ५० ॥

जैसे पितरोंकी प्रिय चिताग्नि मृत शरीरको पाकर प्रज्वलित हो उसे जलाती है और अन्तमें जलका अभिषेक पाकर शान्त हो जाती है, उसी प्रकार पाण्ड्यनरेश घोड़े, हाथी और मनुष्योंके टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें प्रचुर मात्रामें राक्षसोंके लिये भोजन देकर अन्तमें अश्वत्थामाके बाणसे सदाके लिये शान्त हो गये ॥ ५० ॥

समाप्तविद्यं तु गुरोः सुतं नृपः
समाप्तकर्माणमुपेत्य ते सुतः ।
सुहृद्वृतोऽत्यर्थमपूजयन्मुदा
जिते बलौ विष्णुमिवामरेश्वरः ॥ ५१ ॥

जिसने पूरी विद्या समाप्त कर ली है तथा समस्त कर्तव्यकर्म पूर्ण कर लिये हैं, उस गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पास सुहृदोंसहित आकर आपके पुत्र दुर्योधनने प्रसन्नतापूर्वक उसकी बड़ी पूजा की। ठीक उसी तरह जैसे बलिके पराजित होनेपर देवराज इन्द्रने विष्णुका पूजन किया था ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पाण्ड्यवधे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें पाण्ड्यवधविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥


* बाणोंकी दस गतियाँ बतायी गयी हैं, जो इस प्रकार हैं—१-उन्मुखी, २-अभिमुखी, ३-तिर्यक्, ४-मन्दा, ५-गोमूत्रिका, ६-ध्रुवा, ७-स्खलिता, ८-यमकाक्रान्ता, ९-कृष्टा और १०-अतिकृष्टा। इनमेंसे पूर्वकी तीन गतियाँ क्रमशः मस्तक, हृदय तथा पार्श्वदेशका स्पर्श करनेवाली हैं। अर्थात् उन्मुखी गतिसे छोड़ा हुआ बाण मस्तकपर, अभिमुखी गतिसे प्रेरित बाण वक्षःस्थलपर और तिर्यक्-गतिसे चलाया हुआ बाण पार्श्वभागमें आघात करता है। मन्दा गतिसे छोड़े गये बाण त्वचाको कुछ-कुछ छेद पाते हैं। गोमूत्रिका गतिसे चलाये गये बाण बायें और दायें दोनों ओर जाते तथा कवचको भी काट देते हैं। ध्रुवा गति निश्चितरूपसे लक्ष्यका भेदन करानेवाली होती है। स्खलिता कहते हैं, लक्ष्यसे विचलित होनेवाली गतिको। उसके द्वारा संचालित बाण लक्ष्यभ्रष्ट होते हैं। यमकाक्रान्ता वह गति है, जिसके द्वारा प्रेरित बाण बारंबार लक्ष्य वेधकर निकल जाते हैं। कृष्टा उस गतिका नाम है, जो लक्ष्यके एक अवयव भुजा आदिका छेदन करती है। दसवीं गतिका नाम है अतिकृष्टा; जिसके द्वारा चलाया गया बाण शत्रु‌का मस्तक काटकर उसके साथ ही दूर जा गिरता है। (नीलकण्ठीके आधारपर)

अध्याय (पृष्ठ 1719)

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एकविंशोऽध्यायः

कौरव-पाण्डव-दलोंका भयंकर घमासान युद्ध

धृतराष्ट्र उवाच

पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो युधि संजय ।
एकवीरेण कर्णेन द्रावितेषु परेषु च ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! जब युद्धस्थलमें अश्वत्थामाद्वारा पाण्ड्यनरेश मार डाले गये और मेरे पक्षके अद्वितीय वीर कर्णने जब शत्रुसैनिकोंको मार भगाया, उस समय अर्जुनने क्या किया? ॥ १ ॥

समाप्तविद्यो बलवान् युक्तो वीरः स पाण्डवः ।
सर्वभूतेष्वनुज्ञातः शङ्करेण महात्मना ॥ २ ॥
पाण्डुकुमार अर्जुन युद्धविद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके हैं। वे विजयके प्रयत्नमें लगे हुए बलवान् वीर हैं। भगवान् शंकरने उन्हें कृपापूर्वक अनुगृहीत करते हुए यह कह दिया है कि 'तुम समस्त प्राणियोंमें प्रधान एवं अजेय होओगे' ॥ २ ॥

तस्मान्महद् भयं तीव्रममित्रघ्नाद् धनंजयात् ।
स यत् तत्राकरोत् पार्थस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३ ॥
इसलिये उन शत्रुनाशक धनंजयसे मुझे अत्यन्त तीव्र एवं महान् भय बना रहता है। अतः संजय! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने जो कुछ किया हो, वह मुझे बताओ ॥ ३ ॥

संजय उवाच

हते पाण्ड्येऽर्जुनं कृष्णस्त्वरन्नाह वचो हितम् ।
पश्यामि नाहं राजानमपयातांश्च पाण्डवान् ॥ ४ ॥
संजयने कहा—राजन्! पाण्ड्यनरेशके मारे जानेपर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनसे यह हितकर वचन कहा—'पार्थ! मैं राजा युधिष्ठिरको नहीं देख रहा हूँ। युद्धस्थलसे हटे हुए अन्य पाण्डव भी मुझे नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ ४ ॥

निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् ।
अश्वत्थाम्नश्च सङ्कल्पाद्धताः कर्णेन सृञ्जयाः ॥ ५ ॥
तथाश्वरथनागानां कृतं च कदनं महत् ।
'पुनः लौटे हुए पाण्डव-योद्धाओंने विशाल शत्रुसेनामें भगदड़ मचा दी थी; परंतु अश्वत्थामाके संकल्पके अनुसार कर्णने सृंजयौंका संहार कर डाला तथा अपनी सेनाके हाथी, घोड़े एवं रथोंका भारी विनाश कर दिया' ॥ ५ १/२ ॥
सर्वमाख्यातवान् वीरो वासुदेवः किरीटिने ॥ ६ ॥

एतच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च भ्रातुर्घोरं महद्भयम् ।
वाहयाश्वान् हृषीकेश क्षिप्रमित्याह पाण्डवः ॥ ७ ॥
वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने किरीटधारी अर्जुनको ये सारी बातें बतायीं। यह सुनकर तथा अपने भाईके ऊपर आये हुए इस घोर एवं महान् भयको देखकर पाण्डुकुमार अर्जुनने कहा—'हृषीकेश! आप शीघ्र ही इन घोड़ोंको बढ़ाइये' ॥ ६-७ ॥

ततः प्रायाद्धृषीकेशो रथेनाप्रतियोधिना ।
दारुणश्च पुनस्तत्र प्रादुरासीत् समागमः ॥ ८ ॥
तब भगवान् हृषीकेश जिसका सामना करनेवाला दूसरा कोई योद्धा नहीं था उस रथके द्वारा आगे बढ़े। उस समय वहाँ पुनः बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ा हुआ था ॥ ८ ॥

ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः ।
भीमसेनमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ९ ॥
कौरव तथा पाण्डव-योद्धा पुनः निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये थे। पाण्डव-सैनिकोंके प्रधान थे भीमसेन और हमलोगोंका प्रधान था सूतपुत्र कर्ण ॥ ९ ॥

ततः प्रवृत्ते भूयः संग्रामो राजसत्तम ।
कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ १० ॥
नृपश्रेष्ठ! उस समय कर्णका पाण्डव-सैनिकोंके साथ जो पुनः संग्राम आरम्भ हुआ था, वह यमराजके राज्यकी श्रीवृद्धि करनेवाला था ॥ १० ॥

धनूंषि बाणान् परिघानसिपट्टिशतोमरान् ।
मुसलानि भुशुण्डीश्च सशक्त्यृष्टिपरश्वधान् ॥ ११ ॥
गदाः प्रासाञ्छितान् कुन्तान् भिन्दिपालान् महाङ्कुशान् ।
प्रगृह्य क्षिप्रमापेतुः परस्परजिघांसया ॥ १२ ॥
दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे धनुष, बाण, परिघ, खड्ग, पट्टिश, तोमर, मूसल, भुशुण्डी, शक्ति, ऋष्टि, फरसे, गदा, प्रास, तीखे कुन्त, भिन्दिपाल और बड़े-बड़े अंकुश लेकर शीघ्रतापूर्वक युद्धके मैदानमें कूद पड़े थे ॥ ११-१२ ॥

बाणज्यातालशब्देन द्यां दिशः प्रदिशो वियत् ।
पृथिवीं नेमिघोषेण नादयन्तोऽभ्ययुः परान् ॥ १३ ॥
रथी वीर अपने बाणसहित धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि एवं रथके पहियोंकी घर्घरराहटसे आकाश, अन्तरिक्ष, दिशा, विदिशा तथा भूतलको शब्दायमान करते हुए शत्रुओंपर चढ़ आये ॥ १३ ॥

तेन शब्देन महता संहृष्टाश्चक्रुराहवम् ।
वीरा वीरैर्महाघोरं कलहान्तं तितीर्षवः ॥ १४ ॥
कलहके पार जानेकी इच्छा रखनेवाले वे सभी वीर उस महान् शब्दसे हर्ष एवं उत्साहमें भरकर विपक्षी वीरोंके साथ अत्यन्त घोर संग्राम करने लगे ॥ १४ ॥

ज्यातालत्रधनुःशब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् । पादातानां च पततां नृणां नादो महानभूत् ॥ १५ ॥ प्रत्यंचा, हस्तत्राण और धनुषका शब्द, चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाज तथा रणभूमिमें गिरते हुए पैदल मनुष्योंके महान् आर्तनादकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँजने लगी ॥ १५ ॥

तालशब्दांश्च विविधाञ्शूराणां चाभिगर्जताम् । श्रुत्वा तत्र भृशं त्रेसुः पेतुर्मम्लुश्च सैनिकाः ॥ १६ ॥ सामने गर्जना करनेवाले शूरवीरोंके ताल ठोंकनेके विविध शब्द सुनकर कितने ही सैनिक वहाँ भयसे थर्रा उठते थे, कितने ही गिर पड़ते थे और कितने ही ग्लानिसे भर जाते थे ॥ १६ ॥

तेषां निनदतां चैव शस्त्रवर्षं च मुञ्चताम् । बहूनाधिरथिर्वीरः प्रममाथेषुभिः परान् ॥ १७ ॥ जोर-जोरसे गर्जते तथा अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उन शत्रुसैनिकोंमेंसे बहुतोंको वीर कर्णने अपने बाणोंसे मथ डाला ॥ १७ ॥

पञ्च पाञ्चालवीराणां रथान् दश च पञ्च च । साश्वसूतध्वजान् कर्णः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ १८ ॥ उसने अपने बाणोंद्वारा पांचाल वीरोंमेंसे पहले पाँच, फिर दस और फिर पाँच रथियोंको घोड़े, सारथि एवं ध्वजोंसहित मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ १८ ॥

योधमुख्या महावीर्याः पाण्डूनां कर्णमाहवे । शीघ्रास्त्रास्तूर्णमावृत्य परिवव्रुः समन्ततः ॥ १९ ॥ तब समरांगणमें पाण्डवदलके शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले महापराक्रमी प्रधान-प्रधान योद्धाओंने तुरंत आकर कर्णको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १९ ॥

ततः कर्णो द्विषत्सेनां शरवर्षैर्विलोड़यन् । विजगाहाण्डजाकीर्णां पद्मिनीमिव यूथपः ॥ २० ॥ तदनन्तर कर्णने अपने बाणोंकी वर्षासे शत्रुसेनाका मन्थन करते हुए उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे यूथपति गजराज पक्षियोंसे भरे हुए कमलपूर्ण सरोवरमें घुसकर उसे मथने लगता है ॥ २० ॥

द्विषन्मध्यमवस्कन्द्य राधेयो धनुरुत्तमम् । विधुन्वानः शितैर्बाणैः शिरांस्युन्मथ्य पातयत् ॥ २१ ॥ राधापुत्र कर्ण क्रमशः शत्रुसेनाके मध्यभागमें पहुँचकर अपने उत्तम धनुषको कम्पित करता हुआ पैने बाणोंसे शत्रुओंके सिर काट-काटकर गिराने लगा ॥ २१ ॥

चर्मवर्माणि संछिन्नान्यपतन् भुवि देहिनाम् । विषेहुर्नास्य संस्पर्शं द्वितीयस्य पतत्रिणः ॥ २२ ॥

उस समय देहधारियोंके चमड़े और कवच कट-कटकर भूतलपर गिर रहे थे। शत्रुसैनिक कर्णके द्वितीय बाणका स्पर्श नहीं सहन कर पाते थे ।। २२ ।। वर्मदेहासुमथनैर्धनुषः प्रच्युतैः शरैः । मौर्व्या तलत्रे न्यहनत् कशया वाजिनो यथा ॥ २३ ॥ जैसे घुड़सवार घोड़ोंको कोड़ेसे पीटता है, उसी प्रकार कर्ण धनुषसे छूटकर कवच, शरीर और प्राणोंको मथ डालनेवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हस्तत्राणपर भी प्रहार करने लगा ।। २३ ।। पाण्डुसृञ्जयपञ्चालान् शरगोचरमागतान् । ममर्द तरसा कर्णः सिंहो मृगगणानिव ॥ २४ ॥ जैसे सिंह अपनी दृष्टिमें पड़े हुए मृगोंको वेगपूर्वक मसल डालता है, उसी प्रकार कर्णने अपने बाणोंकी पहुँचके भीतर आये हुए पाण्डव, सृंजय तथा पांचाल योद्धाओंको बड़े वेगसे रौंद डाला ।। २४ ।। ततः पाञ्चालराजश्च द्रौपदेयाश्च मारिष । यमौ च युयुधानश्च सहिताः कर्णमभ्ययुः ॥ २५ ॥ मान्यवर! तब पांचालराज धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा नकुल, सहदेव और सात्यकि— इन सबने एक साथ आकर कर्णपर आक्रमण किया ।। २५ ।। तेषु व्यायच्छमानेषु कुरुपाञ्चालपाण्डुषु । प्रियानसून रणे त्यक्त्वा योधा जघ्नुः परस्परम् ॥ २६ ॥ उस समय जब कौरव, पांचाल तथा पाण्डव योद्धा परिश्रमपूर्वक युद्धमें लगे हुए थे, सभी सैनिक रणभूमिमें अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर एक-दूसरेको मारने लगे ।। सुसंनद्धाः कवचिनः सशिरस्त्राणभूषणाः । गदाभिर्मुसलैश्चान्ये परिघैश्च महाबलाः ॥ २७ ॥ समभ्यधावन्त भृशं कालदण्डैरिवोद्यतैः । नर्दन्तश्चाह्वयन्तश्च प्रवल्गन्तश्च मारिष ॥ २८ ॥ माननीय नरेश! कमर कसे, कवच बाँधे तथा शिरस्त्राण एवं आभूषण धारण किये हुए महाबली योद्धा गरजते, उछलते-कूदते और एक-दूसरेको ललकारते हुए कालदण्डके समान गदा, मूसल और परिघ उठाये परस्पर धावा बोल रहे थे ।। २७-२८ ।। ततो निजघ्नुरन्योन्यं पेतुश्चान्योन्यताडिताः । वमन्तो रुधिरं गात्रैर्विमस्तिष्केक्षणायुधाः ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे एक-दूसरेका वध करने, परस्पर चोट खाकर धराशायी होने तथा शरीरसे रक्त बहाने लगे। उनके मस्तिष्क, नेत्र और आयुध नष्ट हो गये थे ।। दन्तपूर्णैः सरुधिरैर्वक्त्रैर्दाडिमसंनिभैः । जीवन्त इव चाप्येके तस्थुः शस्त्रोपबृंहिताः ॥ ३० ॥

कितने ही वीरोंके शरीर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एवं प्राणशून्य होकर पड़े थे; परंतु उनके खुले हुए मुखमें जो रक्तरंजित दाँत थे, उनके द्वारा वे फटे हुए अनारके फलों-जैसे जान पड़ते थे और उस तरहके मुखोंद्वारा वे जीवित-से प्रतीत होते थे ।। ३० ।। परश्वधैश्चाप्यवरे पट्टिशैरसिभिस्तथा । शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च नखरप्रासतोमरैः ।। ३१ ।। ततक्षुश्चिच्छिदुश्चान्ये बिभिदुश्चिक्षिपूस्तथा । संचकर्तुश्च जघ्नुश्च क्रुद्धा रणमहार्णवे ।। ३२ ।। महासागरके समान उस विशाल युद्धस्थलमें परस्पर कुपित हुए अन्यान्य योद्धा परशु, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, भिन्दिपाल, नखर, प्रास तथा तोमरोंद्वारा यथासम्भव एक-दूसरेका छेदन-भेदन, विदारण, क्षेपण, कर्तन और हनन करने लगे ।। ३१-३२ ।। पेतुरन्योन्यनिहता व्यसवो रुधिरोक्षिताः । क्षरन्तः सुरसं रक्तं प्रकृत्ताश्चन्दना इव ।। ३३ ।। जैसे लाल चन्दनके वृक्ष कट जानेपर रक्त वर्णका रस बहाने लगते हैं, उसी प्रकार परस्परके आघातसे मारे गये योद्धा खूनसे लथपथ एवं प्राणशून्य होकर युद्धभूमिमें पड़े थे और अपने अंगोंसे रक्त बहा रहे थे ।। ३३ ।। रथै रथा विनिहता हस्तिभिश्चापि हस्तिनः । नरैर्नरा हताः पेतुरश्वाश्चाश्वैः सहस्रशः ।। ३४ ।। रथियोंसे रथी, हाथियोंसे हाथी, पैदल मनुष्योंसे मनुष्य और घोड़ोंसे घोड़े मारे जाकर रणभूमिमें सहस्रोंकी संख्यामें पड़े थे ।। ३४ ।। ध्वजाः शिरांसि च्छत्राणि द्विपहस्ता नृणां भुजाः । क्षुरैर्भल्लार्धचन्द्रैश्च च्छिन्नाः पेतुर्महीतले ।। ३५ ।। ध्वज, मस्तक, छत्र, हाथीकी सूँड़ तथा मनुष्योंकी भुजाएँ—ये सब-के-सब क्षुरों, भल्लों तथा अर्धचन्द्रोंद्वारा कटकर भूतलपर पड़े थे ।। ३५ ।। नरांश्च नागान् सरथान् हयान् ममृदुराहवे । अश्वारोहैर्हताः शूराश्छिन्नहस्ताश्च दन्तिनः ।। ३६ ।। सपताकाध्वजाः पेतुर्विशीर्णा इव पर्वताः । घुड़सवारोंने कितने ही शूरवीरोंको मार डाला और बड़े-बड़े दन्तार हाथियोंकी सूँड़ें काट लीं। सूँड़ कट जानेपर उन हाथियोंने युद्धस्थलमें बहुत-से मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ोंको कुचल डाला। फिर वे पताका और ध्वजोंसहित टूटे-फूटे पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ३६ ½ ।। पत्तिभिश्च समाप्लुत्य द्विरदाः स्यन्दनास्तथा ।। ३७ ।। हताश्च हन्यमानाश्च पतिताश्चैव सर्वशः ।

पैदल वीरोंद्वारा उछल-उछलकर मारे गये और मारे जाते हुए कितने ही हाथी और रथ सवारोंसहित सब ओर पड़े थे ॥ ३७१/२ ॥
अश्वारोहाः समासाद्य त्वरिताः पत्तिभिर्हताः ॥ ३८ ॥
सादिभिः पत्तिसंघाश्च निहता युधि शेरते ।
कितने ही घुड़सवार बड़ी उतावलीके साथ पैदल वीरोंके पास जाकर उनके द्वारा मारे गये तथा झुंड-के-झुंड पैदल सैनिक भी घुड़सवारोंकी चोटसे मारे जाकर युद्धस्थलमें सदाके लिये सो गये थे ॥ ३८१/२ ॥
मृदितानीव पद्मानि प्रम्लाना इव च स्रजः ॥ ३९ ॥
हतानां वदनान्यासन् गात्राणि च महाहवे ।
उस महासमरमें मारे गये योद्धाओंके मुख और शरीर कुचले हुए कमलों और कुम्हलायी हुई मालाओंके समान श्रीहीन हो गये थे ॥ ३९१/२ ॥
रूपाण्यत्यर्थकान्तानि द्विरदाश्वनृणां नृप ।
समुन्नानीव वस्त्राणि ययुर्दुर्दर्शतां पराम् ॥ ४० ॥
नरेश्वर! हाथी, घोड़े और मनुष्योंके अत्यन्त सुन्दर रूप भी वहाँ कीचड़में सने हुए वस्त्रोंके समान घिनौने हो गये थे। उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1725)

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द्वाविंशोऽध्यायः

पाण्डव-सेनापर भयानक गजसेनाका आक्रमण, पाण्डवोंद्वारा पुण्ड्रकी पराजय तथा बंगराज और अंगराजका वध, गजसेनाका विनाश और पलायन

संजय उवाच

हस्तिभिस्तु महामात्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ।
धृष्टद्युम्नं जिघांसन्तः क्रुद्धाः पार्षतमभ्ययुः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनकी आज्ञा पाकर बहुत-से महावत धृष्टद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे क्रोधपूर्वक हाथियोंके साथ आकर उनपर टूट पड़े ॥ १ ॥
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च प्रवरा गजयोधिनः ।
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च मागधास्ताम्रलिप्तकाः ॥ २ ॥
मेकलाः कोस‌ला मद्रा दशार्णा निषधास्तथा ।
गजयुद्धेषु कुशलाः कलिङ्गैः सह भारत ॥ ३ ॥
शरतोमरनाराचैर्वृष्टिमन्त इवाम्बुदाः ।
सिषिचुस्ते ततः सर्वे पाञ्चालबलमाहवे ॥ ४ ॥
भारत! पूर्व और दक्षिण दिशाके श्रेष्ठ गजयोद्धा तथा अंग, बंग, पुण्ड्र, मगध, ताम्रलिप्त, मेकल, कोसल, मद्र, दशार्ण तथा निषध देशोंके समस्त गजयुद्धनिपुण वीर कलिंगोंके साथ मिलकर वर्षा करनेवाले मेघोंके समान समरांगणमें पांचाल-सेनापर बाण, तोमर और नाराचोंकी वृष्टि करने लगे ॥ २—४ ॥
तान् सम्ममर्दयिषून् नागान् पाष्र्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्भृशम् ।
चोदितान् पार्षतो बाणैर्नाराचैरभ्यवीवृषत् ॥ ५ ॥
वे नाग शत्रुओंकी सारी सेनाको कुचल डालनेकी इच्छा रखते थे और उन्हें पैरोंकी एड़ी, अँगूठों तथा अंकुशोंकी मारसे बारंबार आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया जा रहा था। यह देखकर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने उनपर नाराच नामक बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५ ॥
एकैकं दशभिः षड्भिरष्टाभिरपि भारत ।
द्विरदानभिविव्याध क्षिप्तैर्गिरिनिभान् शरैः ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नने उन पर्वताकार हुए हाथियोंमेंसे प्रत्येकको अपने चलाये हुए दस-दस, छः-छः और आठ-आठ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६ ॥
प्रच्छाद्यमानं द्विरदैर्मेघैरिव दिवाकरम् ।
प्रययुः पाण्डुपाञ्चाला नदन्तो निशितायुधाः ॥ ७ ॥

उस समय मेघोंकी घटासे ढके हुए सूर्यके समान धृष्टद्युम्नको उन हाथियोंसे आच्छादित हुआ देख पाण्डव और पांचाल सैनिक तीखे आयुध लिये गर्जना करते हुए आगे बढ़े ॥ ७ ॥

तान् नागानभिवर्षन्तो ज्यातन्त्रीतलनादितैः ।
वीरनृत्यं प्रनृत्यन्तः शूरतालप्रचोदितैः ।
नकुलः सहदेवश्च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ॥ ८ ॥
सात्यकिश्च शिखण्डी च चेकितानश्च वीर्यवान् ।
समन्तात् सिषिचुर्वीरा मेघास्तोयैरिवाचलान् ॥ ९ ॥
वे प्रत्यंचारूपी वीणाके तारको झंकारते, शूरवीरोंके दिये हुए तालसे प्रेरणा लेते तथा वीरोचित नृत्य करते हुए उन हाथियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। नकुल, सहदेव, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, प्रभद्रकगण, सात्यकि, शिखण्डी तथा पराक्रमी चेकितान—ये सभी वीर चारों ओरसे उन हाथियोंपर उसी प्रकार बाणोंकी वृष्टि करने लगे, जैसे बादल पर्वतोंपर पानी बरसाते हैं ॥ ८-९ ॥

ते म्लेच्छैः प्रेषिता नागा नरानश्वान् रथानपि ।
हस्तैराक्षिप्य ममृदुः पद्भिश्चाप्यतिमन्यवः ॥ १० ॥
म्लेच्छोंद्वारा आगे बढ़ाये हुए वे अत्यन्त क्रोधी गजराज मनुष्यों, घोड़ों और रथोंको अपनी सूँडोंसे उठाकर फेंक देते और उन्हें पैरोंसे मसल डालते थे ॥ १० ॥