महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1723, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकितने ही वीरोंके शरीर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एवं प्राणशून्य होकर पड़े थे; परंतु उनके खुले हुए मुखमें जो रक्तरंजित दाँत थे, उनके द्वारा वे फटे हुए अनारके फलों-जैसे जान पड़ते थे और उस तरहके मुखोंद्वारा वे जीवित-से प्रतीत होते थे ।। ३० ।। परश्वधैश्चाप्यवरे पट्टिशैरसिभिस्तथा । शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च नखरप्रासतोमरैः ।। ३१ ।। ततक्षुश्चिच्छिदुश्चान्ये बिभिदुश्चिक्षिपूस्तथा । संचकर्तुश्च जघ्नुश्च क्रुद्धा रणमहार्णवे ।। ३२ ।। महासागरके समान उस विशाल युद्धस्थलमें परस्पर कुपित हुए अन्यान्य योद्धा परशु, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, भिन्दिपाल, नखर, प्रास तथा तोमरोंद्वारा यथासम्भव एक-दूसरेका छेदन-भेदन, विदारण, क्षेपण, कर्तन और हनन करने लगे ।। ३१-३२ ।। पेतुरन्योन्यनिहता व्यसवो रुधिरोक्षिताः । क्षरन्तः सुरसं रक्तं प्रकृत्ताश्चन्दना इव ।। ३३ ।। जैसे लाल चन्दनके वृक्ष कट जानेपर रक्त वर्णका रस बहाने लगते हैं, उसी प्रकार परस्परके आघातसे मारे गये योद्धा खूनसे लथपथ एवं प्राणशून्य होकर युद्धभूमिमें पड़े थे और अपने अंगोंसे रक्त बहा रहे थे ।। ३३ ।। रथै रथा विनिहता हस्तिभिश्चापि हस्तिनः । नरैर्नरा हताः पेतुरश्वाश्चाश्वैः सहस्रशः ।। ३४ ।। रथियोंसे रथी, हाथियोंसे हाथी, पैदल मनुष्योंसे मनुष्य और घोड़ोंसे घोड़े मारे जाकर रणभूमिमें सहस्रोंकी संख्यामें पड़े थे ।। ३४ ।। ध्वजाः शिरांसि च्छत्राणि द्विपहस्ता नृणां भुजाः । क्षुरैर्भल्लार्धचन्द्रैश्च च्छिन्नाः पेतुर्महीतले ।। ३५ ।। ध्वज, मस्तक, छत्र, हाथीकी सूँड़ तथा मनुष्योंकी भुजाएँ—ये सब-के-सब क्षुरों, भल्लों तथा अर्धचन्द्रोंद्वारा कटकर भूतलपर पड़े थे ।। ३५ ।। नरांश्च नागान् सरथान् हयान् ममृदुराहवे । अश्वारोहैर्हताः शूराश्छिन्नहस्ताश्च दन्तिनः ।। ३६ ।। सपताकाध्वजाः पेतुर्विशीर्णा इव पर्वताः । घुड़सवारोंने कितने ही शूरवीरोंको मार डाला और बड़े-बड़े दन्तार हाथियोंकी सूँड़ें काट लीं। सूँड़ कट जानेपर उन हाथियोंने युद्धस्थलमें बहुत-से मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ोंको कुचल डाला। फिर वे पताका और ध्वजोंसहित टूटे-फूटे पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ३६ ½ ।। पत्तिभिश्च समाप्लुत्य द्विरदाः स्यन्दनास्तथा ।। ३७ ।। हताश्च हन्यमानाश्च पतिताश्चैव सर्वशः ।