महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1722, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय देहधारियोंके चमड़े और कवच कट-कटकर भूतलपर गिर रहे थे। शत्रुसैनिक कर्णके द्वितीय बाणका स्पर्श नहीं सहन कर पाते थे ।। २२ ।। वर्मदेहासुमथनैर्धनुषः प्रच्युतैः शरैः । मौर्व्या तलत्रे न्यहनत् कशया वाजिनो यथा ॥ २३ ॥ जैसे घुड़सवार घोड़ोंको कोड़ेसे पीटता है, उसी प्रकार कर्ण धनुषसे छूटकर कवच, शरीर और प्राणोंको मथ डालनेवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हस्तत्राणपर भी प्रहार करने लगा ।। २३ ।। पाण्डुसृञ्जयपञ्चालान् शरगोचरमागतान् । ममर्द तरसा कर्णः सिंहो मृगगणानिव ॥ २४ ॥ जैसे सिंह अपनी दृष्टिमें पड़े हुए मृगोंको वेगपूर्वक मसल डालता है, उसी प्रकार कर्णने अपने बाणोंकी पहुँचके भीतर आये हुए पाण्डव, सृंजय तथा पांचाल योद्धाओंको बड़े वेगसे रौंद डाला ।। २४ ।। ततः पाञ्चालराजश्च द्रौपदेयाश्च मारिष । यमौ च युयुधानश्च सहिताः कर्णमभ्ययुः ॥ २५ ॥ मान्यवर! तब पांचालराज धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा नकुल, सहदेव और सात्यकि— इन सबने एक साथ आकर कर्णपर आक्रमण किया ।। २५ ।। तेषु व्यायच्छमानेषु कुरुपाञ्चालपाण्डुषु । प्रियानसून रणे त्यक्त्वा योधा जघ्नुः परस्परम् ॥ २६ ॥ उस समय जब कौरव, पांचाल तथा पाण्डव योद्धा परिश्रमपूर्वक युद्धमें लगे हुए थे, सभी सैनिक रणभूमिमें अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर एक-दूसरेको मारने लगे ।। सुसंनद्धाः कवचिनः सशिरस्त्राणभूषणाः । गदाभिर्मुसलैश्चान्ये परिघैश्च महाबलाः ॥ २७ ॥ समभ्यधावन्त भृशं कालदण्डैरिवोद्यतैः । नर्दन्तश्चाह्वयन्तश्च प्रवल्गन्तश्च मारिष ॥ २८ ॥ माननीय नरेश! कमर कसे, कवच बाँधे तथा शिरस्त्राण एवं आभूषण धारण किये हुए महाबली योद्धा गरजते, उछलते-कूदते और एक-दूसरेको ललकारते हुए कालदण्डके समान गदा, मूसल और परिघ उठाये परस्पर धावा बोल रहे थे ।। २७-२८ ।। ततो निजघ्नुरन्योन्यं पेतुश्चान्योन्यताडिताः । वमन्तो रुधिरं गात्रैर्विमस्तिष्केक्षणायुधाः ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे एक-दूसरेका वध करने, परस्पर चोट खाकर धराशायी होने तथा शरीरसे रक्त बहाने लगे। उनके मस्तिष्क, नेत्र और आयुध नष्ट हो गये थे ।। दन्तपूर्णैः सरुधिरैर्वक्त्रैर्दाडिमसंनिभैः । जीवन्त इव चाप्येके तस्थुः शस्त्रोपबृंहिताः ॥ ३० ॥