भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1704

परंतु अर्जुनरूपी वायुने संशप्तक सैनिकरूपी महामेघोंद्वारा की हुई अस्त्र-शस्त्रोंकी उस महावृष्टिको तीखे बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ २१ ॥

साश्वपत्तिद्विपस्थं महाशस्त्रौघसम्प्लवम् । सहसा संतितीर्षन्तं पार्थं शस्त्रास्त्रसेतुना ॥ २२ ॥ अथाब्रवीद् वासुदेवः पार्थ किं क्रीडसेऽनघ । संशप्तकान् प्रमथ्यैनांस्ततः कर्णवधे त्वर ॥ २३ ॥

अर्जुन हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसमूहोंसे युक्त तथा महान् अस्त्र-शस्त्रोंके प्रवाहसे परिपूर्ण उस सैन्य-समुद्रको अपने अस्त्र-शस्त्ररूपी पुलके द्वारा सहसा पार कर जाना चाहते थे। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा—‘निष्पाप पार्थ! यह क्या खिलवाड़ कर रहे हो? इन संशप्तकोंका संहार करके कर्णके वधका शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो’ ॥ २२-२३ ॥

तथेत्युक्त्वार्जुनः कृष्णं शिष्टान् संशप्तकांस्तदा । आक्षिप्य शस्त्रेण बलाद् दैत्यानिन्द्र इवावधीत् ॥ २४ ॥

तब श्रीकृष्णसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अर्जुन दैत्योंका वध करनेवाले इन्द्रके समान उस समय शेष संशप्तक-सेनाको अस्त्र-शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न करके उसका बलपूर्वक विनाश करने लगे ॥ २४ ॥

आददत् संदधन्नेषून् दृष्टः कैश्चिद् रणेऽर्जुनः । विमुञ्चन् वा शरान् शीघ्रं दृश्यन्ते वै नरा हताः ॥ २५ ॥

उस समय रणभूमिमें किसीने यह नहीं देखा कि अर्जुन कब बाण लेते, कब उनका संधान करते अथवा कब उन्हें छोड़ते हैं? केवल उनके द्वारा शीघ्रतापूर्वक मारे गये मनुष्य ही दृष्टिगोचर होते थे ॥ २५ ॥

आश्चर्यमिति गोविन्दो ब्रुवन्नश्वानचोदयत् । हंसांशुगौरास्ते सेनां हंसाः सर इवाविशन् ॥ २६ ॥

‘आश्चर्य है’ ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने घोड़ोंको आगे बढ़ाया। हंस तथा चन्द्र-किरणोंके समान श्वेतवर्णवाले वे घोड़े शत्रुसेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे हंस तालाबमें प्रवेश करते हैं ॥ २६ ॥

ततः संग्रामभूमिं च वर्तमाने जनक्षये । अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ २७ ॥

जब इस प्रकार जनसंहार होने लगा, उस समय रणभूमिकी ओर देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥

एष पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः । पृथिव्यां पार्थिवानां वै दुर्योधनकृते महान् ॥ २८ ॥

‘पार्थ! दुर्योधनके कारण यह भूमण्डलके भूपालों तथा भरतवंशियोंकी सेनाका महाभयंकर एवं महान् संहार हो रहा है ॥ २८ ॥