महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1758, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे पतंगे जलते रहनेपर भी आगमें टूटे पड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें मारे जानेपर भी वे समस्त योद्धा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनको छोड़कर भाग न सके ।। ७ ।।
सत्यसेनस्त्रिभिर्बाणैर्विव्याध युधि पाण्डवम् ।
मित्रदेवस्त्रिषष्ट्या तु चन्द्रदेवस्तु सप्तभिः ।। ८ ।।
मित्रवर्मा त्रिसप्तत्या सौश्रुतिश्चापि सप्तभिः ।
श्रुतंजयस्तु विंशत्या सुशर्मा नवभिः शरैः ।। ९ ।।
सत्यसेनने तीन, मित्रदेवने तिरसठ, चन्द्रदेवने सात, मित्रवर्माने तिहत्तर, सौश्रुतिने सात, श्रुतंजयने बीस तथा सुशर्माने नौ बाणोंसे युद्धस्थलमें पाण्डुपुत्र अर्जुनको बींध डाला ।। ८-९ ।।
स विद्धो बहुभिः संख्ये प्रतिविव्याध तान् नृपान् ।
सौश्रुतिं सप्तभिर्विद्ध्वा सत्यसेनं त्रिभिः शरैः ।। १० ।।
इस प्रकार रणभूमिमें बहुसंख्यक योद्धाओंन्द्वारा घायल किये जानेपर बदलेमें अर्जुनने भी उन सभी नरेशोंको क्षत-विक्षत कर दिया। उन्होंने सौश्रुतिको सात बाणोंसे घायल करके सत्यसेनको तीन बाण मारे ।। १० ।।
श्रुतंजयं च विंशत्या चन्द्रदेवं तथाष्टभिः ।
मित्रदेवं शतेनैव श्रुतसेनं त्रिभिः शरैः ।। ११ ।।
नवभिर्मित्रवर्माणं सुशर्माणं तथाष्टभिः ।
श्रुतंजयको बीस, चन्द्रदेवको आठ, मित्रदेवको सौ, श्रुतसेन (चित्रसेन)-को तीन, मित्रवर्माको नौ तथा सुशर्माको आठ बाणोंसे घायल कर दिया ।। ११ १/२ ।।
श्रुतंजयं च राजानं हत्वा तत्र शिलाशितैः ।। १२ ।।
सौश्रुतेः सशिरस्त्राणं शिरः कायादपाहरत् ।
त्वरितश्चन्द्रदेवं च शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।। १३ ।।
फिर सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कई बाणोंसे राजा श्रुतंजयका वध करके सौश्रुतिके शिरस्त्राणसहित सिरको धड़से अलग कर दिया। फिर तुरंत ही चन्द्रदेवको भी अपने बाणोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया ।। १२-१३ ।।
तथैतरान् महाराज यतमानान् महारथान् ।
पञ्चभिः पञ्चभिर्बाणैरेकैकं प्रत्यवारयत् ।। १४ ।।
महाराज! इसी प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील अन्य महारथियोंमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाण मारकर रोक दिया ।। १४ ।।
सत्यसेनस्तु संक्रुद्धस्तोमरं व्यसृजन्महत् ।
समुद्दिश्य रणे कृष्णं सिंहनादं ननाद च ।। १५ ।।
तब सत्यसेनने अत्यन्त कुपित होकर रणभूमिमें श्रीकृष्णको लक्ष्य करके एक विशाल तोमरका प्रहार किया और सिंहके समान गर्जना की ।। १५ ।।