महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 190, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः
द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद
धृतराष्ट्र उवाच
भारद्वाजेन भग्नेषु पाण्डवेषु महामृधे ।
पञ्चालेषु च सर्वेषु कच्चिदन्योऽभ्यवर्तत ॥ १ ॥
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा क्षत्रियाणां यशस्करीम् ।
असेवितां कापुरुषैः सेवितां पुरुषर्षभैः ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! द्रोणाचार्यने उस महासमरमें जब पाण्डवों तथा समस्त पांचालोंको मार भगाया, तब क्षत्रियोंके लिये यशका विस्तार करनेवाली, कायरोंद्वारा न अपनायी जानेवाली और श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सेवित युद्धविषयक उत्तम बुद्धिका आश्रय लेकर क्या कोई दूसरा वीर भी उनके सामने आया? ॥ १-२ ॥
स हि वीरोन्नतः शूरो यो भग्नेषु निवर्तते ।
अहो नासीत् पुमान् कश्चिद् दृष्ट्वा द्रोणं व्यवस्थितम् ॥ ३ ॥
वही वीरोंमें उन्नतिशील और शौर्यसम्पन्न है, जो सैनिकोंके भाग जानेपर स्वयं युद्धक्षेत्रमें लौटकर आ जाय। अहो! क्या उस समय द्रोणाचार्यको डटा हुआ देखकर पाण्डवोंमें कोई भी वीर पुरुष नहीं था (जो द्रोणाचार्यका सामना कर सके) ॥ ३ ॥
जृम्भमाणमिव व्याघ्रं प्रभिन्नमिव कुञ्जरम् ।
त्यजन्तमाहवे प्राणान् संनद्धं चित्रयोधिनम् ॥ ४ ॥
महेष्वासं नरव्याघ्रं द्विषतां भयवर्धनम् ।
कृतज्ञं सत्यनिरतं दुर्योधनहितैषिणम् ॥ ५ ॥
भारद्वाजं तथानीके दृष्ट्वा शूरमवस्थितम् ।
के शूराः संन्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ६ ॥
जँभाई लेते हुए व्याघ्र तथा मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति पराक्रमी, युद्धमें प्राणोंका विसर्जन करनेके लिये उद्यत, कवच आदिसे सुसज्जित, विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले, शत्रुओंका भय बढ़ानेवाले, कृतज्ञ, सत्यपरायण, दुर्योधनके हितैषी तथा शूरवीर, भरद्वाजनन्दन महाधनुर्धर पुरुषसिंह द्रोणाचार्यको युद्धमें डटा हुआ देख किन शूरवीरोंने लौटकर उनका सामना किया? संजय! यह वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ ४—६ ॥
संजय उवाच
तान् दृष्ट्वा चलितान् संख्ये प्रणुन्नान् द्रोणसायकैः ।
पञ्चालान् पाण्डवान् मत्स्यान् सृञ्जयांश्चेदिकेकयान् ॥ ७ ॥