महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1996, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमांसशोणितपङ्किन्यो घोररूपाः सुदारुणाः । नदीः प्रवर्तयामासुः शोणितौघविवर्धिनीः ॥ ३२ ॥ उनके भीतर मांस और रक्तकी ही कीचड़ जमी थी। रक्तके प्रवाहको बढ़ानेवाली उन घोर एवं भयंकर नदियोंको वहाँ योद्धाओंने प्रवाहित किया था ॥ ३२ ॥
भीरुवित्रासकारिण्यः शूराणां हर्षवर्धनाः । ता नद्यो घोररूपास्तु नयन्त्यो यमसादनम् ॥ ३३ ॥ वे भयानक रूपवाली नदियाँ कायरोंको डराने और शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाली थीं तथा प्राणियोंको यमलोक पहुँचाती थीं ॥ ३३ ॥
अवगाढान् मज्जयन्त्यः क्षत्रस्याजनयन् भयम् । क्रव्यादानां नरव्याघ्र नर्दतां तत्र तत्र ह ॥ ३४ ॥ घोरमायोधनं जज्ञे प्रेतराजपुरोपमम् । जो उनमें प्रवेश करते, उन्हें वे डुबो देती थीं और क्षत्रियोंके मनमें भय उत्पन्न करती थीं। नरव्याघ्र! वहाँ गरजते हुए मांसभक्षी जन्तुओंके शब्दसे वह युद्धस्थल प्रेतराजकी नगरीके समान भयानक जान पड़ता था ॥ ३४ १/२ ॥
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः ॥ ३५ ॥ नृत्यन्ति वै भूतगणाः सुतृप्ता मांसशोणितैः । पीत्वा च शोणितं तत्र वसां पीत्वा च भारत ॥ ३६ ॥ वहाँ चारों ओर उठे हुए अगणित कबन्ध और रक्त-मांससे तृप्त हुए भूतगण नृत्य कर रहे थे। भारत! ये सब-के-सब रक्त तथा वसा पीकर छके हुए थे ॥ ३५-३६ ॥
मेदोमज्जावसामत्तास्तृप्ता मांसस्य चैव ह । धावमानाः स्म दृश्यन्ते काकगृध्रबकास्तथा ॥ ३७ ॥ मेदा, वसा, मज्जा और मांससे तृप्त एवं मतवाले कौए, गीध और बक सब ओर उड़ते दिखायी देते थे ॥
शूरास्तु समरे राजन् भयं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम् । योधव्रतसमाख्याताश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥ ३८ ॥ राजन्! उस समरमें योद्धाओंके व्रतका पालन करनेमें विख्यात शूरवीर जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, उस भयको छोड़कर निर्भयके समान पराक्रम प्रकट करते थे ॥
शरशक्तिसमाकीर्णे क्रव्यादगणसंकुले । व्यचरन्त रणे शूराः ख्यापयन्तः स्वपौरुषम् ॥ ३९ ॥ बाण और शक्तियोंसे व्याप्त तथा मांसभक्षी जन्तुओंसे भरे हुए उस रणक्षेत्रमें शूरवीर अपने पुरुषार्थकी ख्याति बढ़ाते हुए विचर रहे थे ॥ ३९ ॥
अन्योन्यं श्रावयन्ति स्म नामगोत्राणि भारत । पितॄनामानि च रणे गोत्रनामानि वा विभो ॥ ४० ॥