महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2042, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
अर्जुनका श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरके पास चलनेका आग्रह तथा श्रीकृष्णका उन्हें युद्धभूमि दिखाते और वहाँका समाचार बताते हुए रथको आगे बढ़ाना
संजय उवाच
एवमेष महानासीत् संग्रामः पृथिवीक्षिताम् ।
क्रुद्धेऽर्जुने तथा कर्णे भीमसेने च पाण्डवे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार अर्जुन, कर्ण एवं पाण्डुपुत्र भीमसेनके कुपित होनेपर राजाओंका वह संग्राम उत्तरोत्तर बढ़ने लगा ॥ १ ॥
द्रोणपुत्रं पराजित्य जित्वा चान्यान् महारथान् ।
अब्रवीदर्जुनो राजन् वासुदेवमिदं वचः ॥ २ ॥
नरेश्वर! द्रोणपुत्र तथा अन्यान्य महारथियोंको हराकर और उनपर विजय पाकर अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
पश्य कृष्ण महाबाहो द्रवन्तीं पाण्डवीं चमूम् ।
कर्णं पश्य च संग्रामे कालयन्तं महारथान् ॥ ३ ॥
'महाबाहु श्रीकृष्ण! देखिये, वह पाण्डव-सेना भागी जा रही है तथा कर्ण समरांगणमें बड़े-बड़े महारथियोंको कालके गालमें भेज रहा है ॥ ३ ॥
न च पश्यामि दाशार्ह धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
नापि केतुर्युधां श्रेष्ठ धर्मराजस्य दृश्यते ॥ ४ ॥
'दाशार्ह! इस समय मुझे धर्मराज युधिष्ठिर नहीं दिखायी दे रहे हैं। योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! धर्मराजके ध्वजका भी दर्शन नहीं हो रहा है ॥ ४ ॥
त्रिभागश्चावशिष्टोऽयं दिवसस्य जनार्दन ।
न च मां धार्तराष्ट्रेषु कश्चिद् युध्यति संयुगे ॥ ५ ॥
'जनार्दन! इस सम्पूर्ण दिनके ये तीन भाग ही शेष रह गये हैं। दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे कोई भी मेरे साथ युद्ध नहीं कर रहा है' ॥ ५ ॥
तस्मात् त्वं मत्प्रियं कुर्वन् याहि यत्र युधिष्ठिरः ।
दृष्ट्वा कुशलिनं युद्धे धर्मपुत्रं सहानुजम् ॥ ६ ॥
पुनर्योद्धास्मि वार्ष्णेय शत्रुभिः सह संयुगे ।