भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2043, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2043

‘अतः आप मेरा प्रिय करनेके लिये वहीं चलिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं। वार्ष्णेय! भाइयोंसहित धर्मपुत्र युधिष्ठिरको युद्धमें सकुशल देखकर मैं पुनः समरांगणमें शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ ६ ½ ॥
ततः प्रायाद् रथेनाशु बीभत्सोर्वचनाद्धरिः ॥ ७ ॥
यतो युधिष्ठिरो राजा सृञ्जयाश्च महारथाः ।
तदनन्तर अर्जुनके कथनानुसार श्रीकृष्ण तुरंत ही रथके द्वारा उसी ओर चल दिये, जहाँ राजा युधिष्ठिर और संजय महारथी मौजूद थे ॥ ७ ½ ॥
अयुध्यंस्तावकैः सार्धं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ८ ॥
ततः संग्रामभूमिं तां वर्तमाने जनक्षये ।
अवेक्षमाणो गोविन्दः सव्यसाचिनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
वे मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेका निमित्त बनाकर आपके योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे। तदनन्तर जहाँ वह भारी जनसंहार हो रहा था, उस संग्रामभूमिको देखते हुए भगवान् श्रीकृष्ण सव्यसाची अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८-९ ॥
पश्य पार्थ महारौद्रो वर्तते भरतक्षयः ।
पृथिव्यां क्षत्रियाणां वै दुर्योधनकृते महान् ॥ १० ॥
‘कुन्तीनन्दन! देखो, दुर्योधनके कारण भरत-वंशियोंका तथा भूमण्डलके अन्य क्षत्रियोंका महाभयंकर विनाश हो रहा है ॥ १० ॥
पश्य भारत चापानि रुक्मपृष्ठानि धन्विनाम् ।
मृतानामपविद्धानि कलापांश्च महाधनान् ॥ ११ ॥
‘भरतनन्दन! देखो, मरे हुए धनुर्धरोंके ये सोनेके पृष्ठभागवाले धनुष और बहुमूल्य तरकस फेंके पड़े हैं ॥ ११ ॥
जातरूपमयैः पुङ्खैः शरांश्चानतपर्वणः ।
तैलधौतांश्च नाराचान् निर्मुक्तान् पन्नगानिव ॥ १२ ॥
‘सुवर्णमय पंखोंसे युक्त झुकी हुई गाँठवाले बाण तथा तेलमें धोये हुए नाराच केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान दिखायी दे रहे हैं ॥ १२ ॥
हस्तिदन्तत्सरून् खड्गान् जातरूपपरिष्कृतान् ।
वर्माणि चापविद्धानि रुक्मगभीणि भारत ॥ १३ ॥
‘भारत! हाथीके दाँतकी बनी हुई मूंठवाले सुवर्णजटित खड्ग तथा स्वर्णभूषित कवच भी फेंके पड़े हैं ॥ १३ ॥
सुवर्णविकृतान् प्रासाञ्शक्तीः कनकभूषणाः ।
जाम्बूनदमयैः पट्टैर्बद्धाश्च विपुला गदाः ॥ १४ ॥
‘देखो, ये सुवर्णमय प्रास, स्वर्णभूषित शक्तियाँ तथा सोनेके बने हुए पत्रोंसे मढ़ी हुई विशाल गदाएँ पड़ी हैं ॥ १४ ॥

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व · पृष्ठ 2043, कुल 3237 में से · BharatKosha