भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2148

युधामन्युश्चोत्तमौजाः शिखण्डी । एते च सर्वे युधि सम्प्रपीडिता- स्ते मामुपालब्धुमर्हन्ति न त्वम् ॥) धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र, युधामन्यु, उत्तमौजा और शिखण्डी—ये सभी वीर युद्धमें अत्यन्त पीड़ा सहन करते आये हैं; अतः ये ही मुझे उपालम्भ दे सकते हैं, तू नहीं।

बलं तु वाचि द्विजसत्तमानां क्षात्रं बुधा बाहुबलं वदन्ति । त्वं वाग्बलो भारत निष्ठुरश्च त्वमेव मां वेत्थ यथाबलोऽहम् ॥ १२ ॥ भरतनन्दन! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका बल उनकी वाणीमें होता है और क्षत्रियका बल उनकी दोनों भुजाओंमें; परंतु तेरा बल केवल वाणीमें है, तू निष्ठुर है; मैं जैसा बलवान् हूँ, उसे तू ही अच्छी तरह जानता है ॥ १२ ॥

यते हि नित्यं तव कर्तुमिष्टं दारैः सुतैर्जीवितेनात्मना च । एवं यन्मां वाग्विशिखेन हंसि त्वत्तः सुखं न वयं विद्म किंचित् ॥ १३ ॥ मैं सदा स्त्री, पुत्र, जीवन और यह शरीर लगाकर तेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रयत्नशील रहता हूँ। ऐसी दशामें भी तू मुझे अपने वाग्बाणोंसे मार रहा है; हमलोग तुझसे थोड़ा-सा भी सुख न पा सके ॥ १३ ॥

मां मावमंस्था द्रौपदीतल्पसंस्थो महारथान् प्रतिहन्मि त्वदर्थे । तेनातिशङ्की भारत निष्ठुरोऽसि त्वत्तः सुखं नाभिजानामि किंचित् ॥ १४ ॥ तू द्रौपदीकी शय्यापर बैठा-बैठा मेरा अपमान न कर। मैं तेरे ही लिये बड़े-बड़े महारथियोंका संहार कर रहा हूँ। इसीसे तू मेरे प्रति अधिक संदेह करके निष्ठुर हो गया है। तुझसे कोई सुख मिला हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है ॥ १४ ॥

प्रोक्तः स्वयं सत्यसंधेन मृत्यु- स्तव प्रियार्थं नरदेव युद्धे । वीरः शिखण्डी द्रौपदोऽसौ महात्मा मयाभिगुप्तेन हतश्च तेन ॥ १५ ॥ नरदेव! तेरा प्रिय करनेके लिये सत्यप्रतिज्ञ भीष्मजीने युद्धमें महामनस्वी वीर द्रुपदकुमार शिखण्डीको अपनी मृत्यु बताया था। मेरे ही द्वारा सुरक्षित होकर शिखण्डीने उन्हें मारा है ॥ १५ ॥