महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2155, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतं मया पार्थ यथा न साधु येन प्राप्तं व्यसनं वः सुघोरम् ॥ ४३ ॥ तस्माच्छिरश्छिन्धि ममेदमाद्य कुलान्तकस्याधमपूरुषस्य । पापस्य पापव्यसनान्वितस्य विमूढबुद्धेरल्सस्य भीरोः ॥ ४४ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! अवश्य ही मैंने अच्छा कर्म नहीं किया है, जिससे तुमलोगोंपर अत्यन्त भयंकर संकट आ पड़ा है। मैं कुलान्तकारी नराधम पापी, पापमय दुर्व्यसनमें आसक्त, मूढ़बुद्धि, आलसी और डरपोक हूँ; इसलिये आज तुम मेरा यह मस्तक काट डालो ॥ ४३-४४ ॥ वृद्धावमन्तुः परुषस्य चैव किं ते चिरं मे ह्यनुसृत्य रूक्षम् । गच्छाम्यहं वनमेवाद्य पापः सुखं भवान् वर्ततां मद्विहीनः ॥ ४५ ॥ ‘मैं बड़े बूढ़ोंका अनादर करनेवाला और कठोर हूँ। तुम्हें मेरी रूखी बातोंका दीर्घकालतक अनुसरण करनेकी क्या आवश्यकता है। मैं पापी आज वनमें ही चला जा रहा हूँ। तुम मुझसे अलग होकर सुखसे रहो ॥ ४५ ॥ योग्यो राजा भीमसेनो महात्मा क्लीबस्य वा मम किं राज्यकृत्यम् । न चापि शक्तः परुषाणि सोढुं पुनस्तवेमानि रुषान्वितस्य ॥ ४६ ॥ ‘महामनस्वी भीमसेन सुयोग्य राजा होंगे। मुझ कायरको राज्य लेनेसे क्या काम है? अब पुनः मुझमें तुम्हारे रोषपूर्वक कहे हुए इन कठोर वचनोंको सहनेकी शक्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ भीमोऽस्तु राजा मम जीवितेन न कार्यमद्यावमतस्य वीर । इत्येवमुक्त्वा सहसोत्पपात राजा ततस्तच्छयनं विहाय ॥ ४७ ॥ इयेष निर्गन्तुमथो वनाय तं वासुदेवः प्रणतोऽभ्युवाच ॥ ४८ ॥ ‘वीर! भीमसेन राजा हों। आज इतना अपमान हो जानेपर मुझे जीवित रहनेकी आवश्यकता नहीं है।' ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिर सहसा पलंग छोड़कर वहाँसे नीचे कूद