भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2157

भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने अपने चरणोंमें पड़े हुए हृषीकेशको वेगपूर्वक उठाकर फिर दोनों हाथ जोड़कर यह बात कही— ।।

एवमेव यथाऽऽत्थ त्वमस्येषोऽतिक्रमो मम ।। ५७ ।।
अनुनीतोऽस्मि गोविन्द तारितश्चास्मि माधव ।
मोचिता व्यसनाद् घोराद् वयमद्य त्वयाच्युत ।। ५८ ।।

‘गोविन्द! आप जैसा कहते हैं, वह ठीक है। वास्तवमें मुझसे यह नियमका उल्लंघन हो गया है। माधव! आपने अनुनयद्वारा मुझे संतुष्ट कर दिया और संकटके समुद्रमें डूबनेसे बचा लिया। अच्युत! आज आपके द्वारा हमलोग घोर विपत्तिसे बच गये ।। ५७-५८ ।।

भवन्तं नाथमासाद्य ह्यावां व्यसनसागरात् ।
घोरादद्य समुत्तीर्णावुभावज्ञानमोहितौ ।। ५९ ।।
त्वद्बुद्धिप्लवमासाद्य दुःखशोकार्णवाद् वयम् ।
समुत्तीर्णाः सहामात्याः सनाथाः स्म त्वयाच्युत ।। ६० ।।

‘आज आपको अपना रक्षक पाकर हम दोनों संकटके भयानक समुद्रसे पार हो गये। हम दोनों ही अज्ञानसे मोहित हो रहे थे; परंतु आपकी बुद्धिरूपी नौकाका आश्रय लेकर दुःख-शोकके समुद्रसे मन्त्रियोंसहित पार हो गये। अच्युत! हम आपसे ही सनाथ हैं’ ।। ५९-६० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि युधिष्ठिरसमाश्वासने सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।)