भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2160, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2160

महाराज! वे दोनों महातेजस्वी भाई दीर्घकालतक रोते रहे। इससे उनके मनकी मैल धुल गयी और वे दोनों भाई परस्पर प्रेमसे भर गये ॥ १५ ॥
तत आश्लिष्य तं प्रेम्णा मूर्ध्नि चाघ्राय पाण्डवः ।
प्रीत्या परमया युक्तो विस्मयंश्च पुनः पुनः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् तं महेष्वासं धर्मराजो धनंजयम् ।
तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न हो बारंबार मुसकराते हुए पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने महाधनुर्धर धनंजयको बड़े प्रेमसे हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १६ १/२ ॥
कर्णेन मे महाबाहो सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ १७ ॥
कवचं च ध्वजं चैव धनुः शक्तिर्हयाः शराः ।
शरैः कृत्ता महेष्वास यतमानस्य संयुगे ॥ १८ ॥
'महाधनुर्धर! महाबाहो! मैं युद्धमें यत्नपूर्वक लगा हुआ था, किंतु कर्णने सारी सेनाके देखते-देखते अपने बाणोंद्वारा मेरे कवच, ध्वज, धनुष, शक्ति, घोड़े और बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं' ॥ १७-१८ ॥
सोऽहं ज्ञात्वा रणे तस्य कर्म दृष्ट्वा च फाल्गुन ।
व्यवसीदामि दुःखेन न च मे जीवितं प्रियम् ॥ १९ ॥
'फाल्गुन! रणभूमिमें उसके इस कर्मको देख और समझकर मैं दुःखसे पीड़ित हो रहा हूँ। मुझे अपना जीवन प्रिय नहीं रह गया है ॥ १९ ॥
न चेदद्य हि तं वीरं निहनिष्यसि संयुगे ।
प्राणानेव परित्यक्ष्ये जीवितार्थो हि को मम ॥ २० ॥
'यदि आज युद्धस्थलमें तुम वीर कर्णका वध नहीं करोगे तो मैं अपने प्राणोंका ही परित्याग कर दूँगा। फिर मेरे जीवनका प्रयोजन ही क्या है?' ॥ २० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच विजयो भरतर्षभ ।
सत्येन ते शपे राजन् प्रसादेन तथैव च ।
भीमेन च नरश्रेष्ठ यमाभ्यां च महीपते ॥ २१ ॥
यथाद्य समरे कर्णं हनिष्यामि हतोऽपि वा ।
महीतले पतिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उत्तर दिया—'राजन्! नरश्रेष्ठ महीपाल! मैं आपसे सत्यकी, आपके कृपापूर्ण प्रसादकी, भीमसेनकी तथा नकुल और सहदेवकी शपथ खाकर सत्यके द्वारा अपने धनुषको छूकर कहता हूँ कि आज समरमें या तो कर्णको मार डालूँगा या स्वयं ही मारा जाकर पृथ्वीपर गिर जाऊँगा' ॥ २१-२२ ॥
एवमाभाष्य राजानमब्रवीन्माधवं वचः ।
अद्य कर्णं रणे कृष्ण सूदयिष्ये न संशयः ॥ २३ ॥

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