भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2246

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अशीतितमोऽध्यायः

अर्जुनका कौरव-सेनाको नष्ट करके आगे बढ़ना

संजय उवाच

राजन् कुरूणां प्रवरैर्बलैर्भीममभिद्रुतम् । मज्जन्तमिव कौन्तेयमुज्जिहीर्षुर्धनंजयः ॥ १ ॥ विसृज्य सूतपुत्रस्य सेनां भारत सायकैः । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय परवीरान् धनंजयः ॥ २ ॥ संजय कहते हैं— राजन्! कौरव-सेनाके प्रमुख वीरोंने कुन्तीपुत्र भीमसेनपर धावा किया था और वे उस सैन्यसागरमें डूबते-से जान पड़ते थे। भारत! उस समय उनका उद्धार करनेके लिये अर्जुनने सूतपुत्रकी सेनाको छोड़कर उधर ही आक्रमण किया और बाणोंद्वारा शत्रुपक्षके बहुत-से वीरोंको यमलोक भेज दिया ॥ १-२ ॥

ततोऽस्याम्बरमाश्रित्य शरजालानि भागशः । अदृश्यन्त तथान्ये च निघ्नन्तस्तव वाहिनीम् ॥ ३ ॥ तदनन्तर अर्जुनके बाणजाल आकाशके विभिन्न भागोंमें छा गये, वे तथा और भी बहुत-से बाण आपकी सेनाका संहार करते दिखायी दिये ॥ ३ ॥

स पक्षिसंघाचरितमाकाशं पूरयन् शरैः । धनंजयो महाबाहुः कुरूणामन्तकोऽभवत् ॥ ४ ॥ जहाँ पक्षियोंके झुंड उड़ा करते थे, उस आकाशको बाणोंसे भरते हुए महाबाहु धनंजय वहाँ कौरव-सैनिकोंके काल बन गये ॥ ४ ॥

ततो भल्लैः क्षुरप्रैश्च नाराचैर्विमलैरपि । गात्राणि प्राच्छिनत् पार्थः शिरांसि च चकर्त ह ॥ ५ ॥ पार्थने भल्लों, क्षुरप्रों तथा निर्मल नाराचोंद्वारा शत्रुओंका अंग-अंग काट डाला और उनके मस्तक भी धड़से अलग कर दिये ॥ ५ ॥

छिन्नगात्रैर्विकवचैर्विशिरस्कैः समन्ततः । पातितैश्च पतद्भिश्च योधैरासीत् समावृता ॥ ६ ॥ जिनके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे, कवच कटकर गिर गये थे और मस्तक भी काट डाले गये थे, ऐसे बहुत-से योद्धा वहाँ पृथ्वीपर गिरे थे और गिरते जा रहे थे, उन सबकी लाशोंसे वहाँकी भूमि सब ओरसे पट गयी थी ॥ ६ ॥

धनंजयशराभ्यस्तैः स्यन्दनाश्चरथद्विपैः । संछिन्नभिन्नविध्वस्तैर्व्यङ्गाङ्गावयवैः स्तृता ॥ ७ ॥