भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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सप्तविंशोऽध्यायः

अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध

संजय उवाच

यन्मां पार्थस्य संग्रामे कर्माणि परिपृच्छसि ।
तच्छृणुष्व महाबाहो पार्थो यदकरोद् रणे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाबाहो! आप जो मुझसे युद्धमें अर्जुनके पराक्रम पूछ रहे हैं, उन्हें बताता हूँ। अर्जुनने रणक्षेत्रमें जो कुछ किया था, वह सुनिये ॥ १ ॥

रजो दृष्ट्वा समुद्भूतं श्रुत्वा च गजनिःस्वनम् ।
भगदत्ते विकुर्वाणे कौन्तेयः कृष्णमब्रवीत् ॥ २ ॥
भगदत्तके विचित्र रूपसे युद्ध करते समय वहाँ धूल उड़ती देखकर और हाथीके चिग्घाड़नेका शब्द सुनकर कुन्तीनन्दन अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा— ॥ २ ॥

यथा प्राग्ज्योतिषो राजा गजेन मधुसूदन ।
त्वरमाणो विनिष्क्रान्तो ध्रुवं तस्यैष निःस्वनः ॥ ३ ॥
‘मधुसूदन! राजा भगदत्त अपने हाथीपर सवार जिस प्रकार उतावलीके साथ युद्धके लिये निकले थे, उससे जान पड़ता है निश्चय ही यह महान् कोलाहल उन्हींका है ॥ ३ ॥

इन्द्रादनवरः संख्ये गजयानविशारदः ।
प्रथमो गजयोधानां पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ४ ॥
‘मेरा तो यह विश्वास है कि वे युद्धमें इन्द्रसे कम नहीं है। भगदत्त हाथीकी सवारीमें कुशल और गजारोही योद्धाओंमें इस पृथ्वीपर सबसे प्रधान हैं ॥ ४ ॥

स चापि द्विरदश्रेष्ठः सदाऽप्रतिगजो युधि ।
सर्वशस्त्रातिगः संख्ये कृतकर्मा जितक्लमः ॥ ५ ॥
‘और उनका वह गजश्रेष्ठ सुप्रतीक भी युद्धमें अपना शानी नहीं रखता है। वह सब शास्त्रोंका उल्लंघन करके युद्धमें अनेक बार पराक्रम प्रकट कर चुका है। उसने परिश्रमको जीत लिया है ॥ ५ ॥

सहः शस्त्रनिपातानामग्निस্পর্শस्य चानघ ।
स पाण्डवबलं सर्वमद्यैको नाशयिष्यति ॥ ६ ॥
‘अनघ! वह सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघात तथा अग्निके स्पर्शको भी सह सकनेवाला है। आज वह अकेला ही समस्त पाण्डव-सेनाका विनाश कर डालेगा ॥ ६ ॥

न चावाभ्यामृतेऽन्योऽस्ति शक्तस्तं प्रतिबाधितुम् ।