महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 236, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वरमाणस्ततो याहि यतः प्राग्ज्योतिषाधिपः ॥ ७ ॥
'हम दोनोंके सिवा दूसरा कोई नहीं है, जो उसे बाधा देनेमें समर्थ हो। अतः आप शीघ्रतापूर्वक वहीं चलिये, जहाँ प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त विद्यमान हैं' ॥ ७ ॥
दृप्तं संख्ये द्विपबलाद् वयसा चापि विस्मितम् ।
अद्यैनं प्रेषयिष्यामि बलहन्तुः प्रियातिथिम् ॥ ८ ॥
'अपने हाथीके बलसे युद्धमें घमंड दिखानेवाले और अवस्थामें भी बड़े होनेका अहंकार रखनेवाले इन राजा भगदत्तको मैं देवराज इन्द्रका प्रिय अतिथि बनाकर स्वर्गलोक भेज दूँगा' ॥ ८ ॥
वचनादथ कृष्णस्तु प्रययौ सव्यसाचिनः ।
दीर्यते भगदत्तेन यत्र पाण्डववाहिनी ॥ ९ ॥
सव्यसाची अर्जुनके इस वचनसे प्रेरित हो श्रीकृष्ण उस स्थानपर रथ लेकर गये, जहाँ भगदत्त पाण्डव-सेनाका संहार कर रहे थे ॥ ९ ॥
तं प्रयान्तं ततः पश्चादाह्वयन्तो महारथाः ।
संशप्तकाः समारोहन् सहस्राणि चतुर्दश ॥ १० ॥
अर्जुनको जाते देख पीछेसे चौदह हजार संशप्तक महारथी उन्हें ललकारते हुए चढ़ आये ॥ १० ॥
दशैव तु सहस्राणि त्रिगर्तानां महारथाः ।
चत्वारि च सहस्राणि वासुदेवस्य चानुगाः ॥ ११ ॥
उनमें दस हजार महारथी तो त्रिगर्तदेशके थे और चार हजार भगवान् श्रीकृष्णके सेवक (नारायणी-सेनाके सैनिक) थे ॥ ११ ॥
दीर्यमाणां चमूं दृष्ट्वा भगदत्तेन मारिष ।
आहूयमानस्य च तैरभवद्धृदयं द्विधा ॥ १२ ॥
आर्य! राजा भगदत्तके द्वारा अपनी सेनाको विदीर्ण होती देखकर तथा पीछेसे संशप्तकोंकी ललकार सुनकर उनका हृदय दुविधामें पड़ गया ॥ १२ ॥
किं नु श्रेयस्करं कर्म भवेदद्येति चिन्तयन् ।
इह वा विनिवर्तेयं गच्छेयं वा युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥
वे सोचने लगे—आज मेरे लिये कौन-सा कार्य श्रेयस्कर होगा। यहाँसे संशप्तकोंकी ओर लौट चलूँ अथवा युधिष्ठिरके पास जाऊँ ॥ १३ ॥
तस्य बुद्ध्या विचार्यैवमर्जुनस्य कुरूद्वह ।
अभवद् भूयसी बुद्धिः संशप्तकवधे स्थिरा ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बुद्धिसे इस प्रकार विचार करनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव अत्यन्त दृढ़ हुआ कि संशप्तकोंके वधका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ १४ ॥
स संनिवृत्तः सहसा कपिप्रवरकेतनः ।