महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 237, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएको रथसहस्राणि निहन्तुं वासवी रणे ॥ १५ ॥
श्रेष्ठ वानरचिह्नसे सुशोभित ध्वजावाले इन्द्रकुमार अर्जुन उपर्युक्त बात सोचकर सहसा लौट पड़े। वे रणक्षेत्रमें अकेले ही हजारों रथियोंका संहार करनेको उद्यत थे ॥ १५ ॥
सा हि दुर्योधनस्यासीन्मतिः कर्णस्य चोभयोः ।
अर्जुनस्य वधोपाये तेन द्वैधमकल्पयत् ॥ १६ ॥
अर्जुनके वधका उपाय सोचते हुए दुर्योधन और कर्ण दोनोंके मनमें यही विचार उत्पन्न हुआ था। इसीलिये उसने युद्धको दो भागोंमें बाँट दिया ॥ १६ ॥
स तु दोलायमानोऽभूद् द्वैधीभावेन पाण्डवः ।
वधेन तु नराग्र्याणामकरोत् तां मृषा तदा ॥ १७ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन एक बार दुविधामें पड़कर चंचल हो गये थे, तथापि नरश्रेष्ठ संशप्तक वीरोंके वधका निश्चय करके उन्होंने उस दुविधाको मिथ्या कर दिया था ॥ १७ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ।
असृजन्नर्जुने राजन् संशप्तकमहारथाः ॥ १८ ॥
राजन्! तदनन्तर संशप्तक महारथियोंने अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक लाख बाणोंकी वर्षा की ॥ १८ ॥
नैव कुन्तीसुतः पार्थो नैव कृष्णो जनार्दनः ।
न हया न रथो राजन् दृश्यन्ते स्म शरैश्चिताः ॥ १९ ॥
महाराज! उस समय न तो कुन्तीकुमार अर्जुन, न जनार्दन श्रीकृष्ण, न घोड़े और न रथ ही दिखायी देते थे। सब-के-सब वहाँ बाणोंके ढेरसे आच्छादित हो गये थे ॥ १९ ॥
तदा मोहमनुप्राप्तः सिष्विदे हि जनार्दनः ।
ततस्तान् प्रायशः पार्थो ब्रह्मास्त्रेण निजघ्निवान् ॥ २० ॥
उस अवस्थामें भगवान् जनार्दन पसीने-पसीने हो गये। उनपर मोह-सा छा गया। यह देख अर्जुनने ब्रह्मास्त्रसे उन सबको अधिकांशमें नष्ट कर दिया ॥ २० ॥
शतशः पाणयश्छिन्नाः सेषुज्यातालकार्मुकाः ।
केतवो वाजिनः सूता रथिनश्चापतन् क्षितौ ॥ २१ ॥
सैकड़ों भुजाएँ बाण, प्रत्यंचा और धनुषसहित कट गयीं। ध्वज, घोड़े, सारथि और रथी सभी धराशायी हो गये ॥ २१ ॥
द्रुमाचलाग्राम्बुधरैः समकायाः सुकल्पिताः ।
हतारोहाः क्षितौ पेतुर्द्विपाः पार्थशराहताः ॥ २२ ॥
वृक्ष, पर्वत-शिखर और मेघोंके समान विशाल एवं ऊँचे शरीरवाले, सजे-सजाये हाथी, जिनके सवार पहले ही मार दिये गये थे, अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥
विप्रविद्धकुथा नागाश्छिन्नभाण्डाः परासवः ।