भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 238

सारोहास्तु रणे पेतुर्मथिता मार्गणैर्भृशम् ॥ २३ ॥ उस रणक्षेत्रमें बहुत-से हाथी अर्जुनके बाणोंसे मथित होकर सवारोंसहित प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय उनके झूल चिथड़े-चिथड़े होकर दूर जा पड़े थे और उनके आभूषणोंके भी टुकड़े-टुकड़े हो गये थे॥ २३ ॥

सर्ष्टिप्रासासिनखराः समुद्गरपरश्वधाः । विच्छिन्ना बाहवः पेतुर्नॄणां भल्लैः किरीटिना ॥ २४ ॥ किरीटधारी अर्जुनके भल्लनामक बाणोंसे ऋष्टि, प्रास, खड्ग, नखर, मुद्गर और फरसोंसहित वीरोंकी भुजाएँ कटकर गिर गयीं ॥ २४ ॥

बालादित्याम्बुजेन्दूनां तुल्यरूपाणि मारिष । संच्छिन्नान्यर्जुनशरैः शिरांस्युर्व्यां प्रपेदिरे ॥ २५ ॥ आर्य! योद्धाओंके मस्तक, जो बालसूर्य, कमल और चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥

जज्वालालंकृता सेना पत्रिभिः प्राणिभोजनैः । नानारूपैस्तदामित्रान् क्रुद्धे निघ्नति फाल्गुने ॥ २६ ॥ जब क्रोधमें भरे हुए अर्जुन नाना प्रकारके प्राणनाशक बाणोंद्वारा शत्रुओंका नाश करने लगे, उस समय आभूषणोंसे विभूषित हुई संशप्तकोंकी सारी सेना जलने लगी ॥ २६ ॥

क्षोभयन्तं तदा सेनां द्विरदं नलिनीमिव । धनंजयं भूतगणाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ २७ ॥ जैसे हाथी कमलोंसे भरे हुए सरोवरको मथ डालता है, उसी प्रकार अर्जुनको सारी सेनाका विनाश करते देख सब प्राणी 'साधु-साधु' कहकर अर्जुनकी प्रशंसा करने लगे ॥ २७ ॥

दृष्ट्वा तत् कर्म पार्थस्य वासवस्येव माधवः । विस्मयं परमं गत्वा प्राञ्जलिस्तमुवाच ह ॥ २८ ॥ इन्द्रके समान अर्जुनका वह पराक्रम देख भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त आश्चर्यमें पड़कर हाथ जोड़े हुए बोले— ॥ २८ ॥

कर्मैतत् पार्थ शक्रेण यमेन धनदेन च । दुष्करं समरे यत् ते कृतमद्येति मे मतिः ॥ २९ ॥ 'पार्थ! मेरा ऐसा विश्वास है कि आज समर-भूमिमें तुमने जो कार्य किया है, यह इन्द्र, यम और कुबेरके लिये भी दुष्कर है ॥ २९ ॥

युगपच्चैव संग्रामे शतशोऽथ सहस्रशः । पतिता एव मे दृष्टाः संशप्तकमहारथाः ॥ ३० ॥ 'इस संग्राममें मैंने सैकड़ों और हजारों संशप्तक महारथियोंको एक साथ ही गिरते देखा है' ॥ ३० ॥