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भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2378, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2378

'यदि उन अवसरोंपर यह धर्म नहीं था तो आज भी यहाँ सर्वथा धर्मकी दुहाई देकर तालु सुखानेसे क्या लाभ? सूत! अब यहाँ धर्मके कितने ही कार्य क्यों न कर डालो, तथापि जीते-जी तुम्हारा छुटकारा नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ नलो ह्यक्षैर्निर्जितः पुष्करेण पुनर्यशो राज्यमवाप वीर्यात् । प्राप्तास्तथा पाण्डवा बाहुवीर्यात् सर्वैः समेताः परिवृत्तलोभाः ॥ १३ ॥ निहत्य शत्रून् समरे प्रवृद्धान् ससोमका राज्यमवाप्नुयुस्ते । तथा गता धार्तराष्ट्रा विनाशं धर्माभिगुप्तैः सततं नृसिंहैः ॥ १४ ॥ 'पुष्करने राजा नलको जूएमें जीत लिया था; किंतु उन्होंने अपने ही पराक्रमसे पुनः अपने राज्य और यश दोनोंको प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार लोभशून्य पाण्डव भी अपनी भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण सगे-सम्बन्धियोंके साथ रहकर समरांगणमें बढ़े-चढ़े शत्रुओंका संहार करके फिर अपना राज्य प्राप्त करेंगे। निश्चय ही ये सोमकोंके साथ अपने राज्यपर अधिकार कर लेंगे। पुरुषसिंह पाण्डव सदैव अपने धर्मसे सुरक्षित हैं; अतः इनके द्वारा अवश्य धृतराष्ट्रके पुत्रोंका नाश हो जायगा' ॥ १३-१४ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तस्तदा कर्णो वासुदेवेन भारत । लज्जयावनतो भूत्वा नोत्तरं किञ्चिदुक्तवान् ॥ १५ ॥ **संजय कहते हैं—**भारत! उस समय भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कर्णने लज्जासे अपना सिर झुका लिया, उससे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना ॥ १५ ॥ क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठो धनुरुद्यम्य भारत । योधयामास वै पार्थं महावेगपराक्रमः ॥ १६ ॥ भरतनन्दन! वह महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न हो क्रोधसे ओठ फड़फड़ाता हुआ धनुष उठाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १६ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवः फाल्गुनं पुरुषर्षभम् । दिव्यास्त्रेणैव निर्भिद्य पातयस्व महाबल ॥ १७ ॥ तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने पुरुषप्रवर अर्जुनसे इस प्रकार कहा—'महाबली वीर! तुम कर्णको दिव्यास्त्रसे ही घायल करके मार गिराओ' ॥ १७ ॥ एवमुक्तस्तु देवेन क्रोधमागात्तदार्जुनः । मन्युमभ्याविशद् घोरं स्मृत्वा तत्तु धनंजयः ॥ १८ ॥