महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 254, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
प्रियमिन्द्रस्य सततं सखायममितौजसम् ।
हत्वा प्राग्ज्योतिषं पार्थः प्रदक्षिणमवर्तत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जो सदा इन्द्रके प्रिय सखा रहे हैं, उन अमित तेजस्वी प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तको मारकर अर्जुन दाहिनी ओर घूमे ॥ १ ॥
ततो गान्धारराजस्य सुतौ परपुरंजयौ ।
अर्दतामर्जुनं संख्ये भ्रातरौ वृषकाचलौ ॥ २ ॥
उधरसे गान्धारराज सुबलके दो पुत्र शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वृषक और अचल दोनों भाई आ पहुँचे और युद्धमें अर्जुनको पीड़ित करने लगे ॥ २ ॥
तौ समेत्यार्जुनं वीरौ पुरः पश्चाच्च धन्विनौ ।
अविध्येतां महावेगैर्निशितैराशुगैर्भृशम् ॥ ३ ॥
उन दोनों धनुर्धर वीरोंने अर्जुनपर आगे और पीछेसे भी आक्रमण करके अत्यन्त वेगशाली पैने बाणोंद्वारा उन्हें बहुत घायल कर दिया ॥ ३ ॥
वृषकस्य हयान् सूतं धनुश्छत्रं रथं ध्वजम् ।
तिलशो व्यधमत् पार्थः सौबलस्य शितैः शरैः ॥ ४ ॥
तब कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा सुबलपुत्र वृषकके घोड़ों, सारथि, रथ, धनुष, छत्र और ध्वजाको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ४ ॥
ततोऽर्जुनः शरव्रातैर्नानाप्रहरणैरपि ।
गान्धारानाकुलांश्चक्रे सौबलप्रमुखान् पुनः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने अपने बाणसमूहों तथा नाना प्रकारके आयुधोंद्वारा सुबलपुत्र आदि समस्त गान्धारोंको पुनः व्याकुल कर दिया ॥ ५ ॥
ततः पञ्चशतान् वीरान् गान्धारानुद्यतायुधान् ।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो बाणैर्धनंजयः ॥ ६ ॥
फिर क्रोधमें भरे हुए धनंजयने हथियार उठाये हुए पाँच सौ गान्धारदेशीय वीरोंको अपने बाणोंसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ६ ॥
हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवतीर्य महाभुजः ।
आरुरोह रथं भ्रातुरन्यच्च धनुरददे ॥ ७ ॥