भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 255

महाबाहु वृषक उस अश्वहीन रथसे शीघ्र उतरकर अपने भाई अचलके रथपर जा चढ़ा। फिर उसने अपने हाथमें दूसरा धनुष ले लिया ॥ ७ ॥

तावेकरथमारूढौ भ्रातरौ वृषकाचलौ ।
शरवर्षेण बीभत्सुमविध्येतां मुहुर्मुहुः ॥ ८ ॥
इस प्रकार एक रथपर बैठे हुए वे दोनों भाई वृषक और अचल बारंबार बाणोंकी वर्षासे अर्जुनको घायल करने लगे ॥ ८ ॥

श्यालौ तव महात्मानौ राजानौ वृषकाचलौ ।
भृशं विजघ्नतुः पार्थमिन्द्रं वृत्रबलाविव ॥ ९ ॥
महाराज! आपके दोनों साले महामनस्वी राजकुमार वृषक और अचल, इन्द्रको वृत्रासुर तथा बलासुरके समान, अर्जुनको अत्यन्त घायल करने लगे ॥ ९ ॥

लब्धलक्ष्यौ तु गान्धारावहतां पाण्डवं पुनः ।
निदाघवार्षिकौ मासौ लोकं घर्मांशुभिर्यथा ॥ १० ॥
जैसे गर्मीके दो महीने सूर्यकी उष्ण किरणोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको संतप्त करते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई गान्धारराजकुमार लक्ष्य वेधनेमें सफल होकर पाण्डुपुत्र अर्जुनपर बारंबार आघात करने लगे ॥ १० ॥

तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ सजानौ वृषकाचलौ ।
संश्लिष्टाङ्गौ स्थितौ राजन् जघानेकेषुणाऽर्जुनः ॥ ११ ॥
राजन्! वे नरश्रेष्ठ राजकुमार वृषक और अचल रथपर एक-दूसरेसे सटकर खड़े थे। उसी अवस्थामें अर्जुनने एक ही बाणसे उन दोनोंको मार डाला ॥ ११ ॥

तौ रथात् सिंहसंकाशौ लोहिताक्षौ महाभुजौ ।
राजन् सम्पेततुर्वीरौ सोदर्यावेकलक्षणौ ॥ १२ ॥
महाराज! वे दोनों वीर परस्पर सगे भाई होनेके कारण एक-जैसे लक्षणोंसे युक्त थे। दोनों ही सिंहके समान पराक्रमी, लाल नेत्रोंवाले तथा विशाल भुजाओंसे सुशोभित थे। वे दोनों एक ही साथ रथसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥

तयोर्भूमिं गतौ देहौ रथाद् बन्धुजनप्रियौ ।
यशो दश दिशः पुण्यं गमयित्वा व्यवस्थितौ ॥ १३ ॥
उन दोनों भाइयोंके शरीर उनके बन्धुजनोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे। वे अपने पवित्र यशको दसों दिशाओंमें फैलाकर रथसे भूतलपर गिरे और वहीं स्थिर हो गये ॥ १३ ॥

दृष्ट्वा विनिहतौ संख्ये मातुलावपलायिनौ ।
भृशं मुमुचुरश्रूणि पुत्रास्तव विशाम्पते ॥ १४ ॥
प्रजानाथ! युद्धसे पीठ न दिखानेवाले अपने दोनों मामाओंको युद्धमें मारा गया देख आपके सभी पुत्र अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी अत्यन्त वर्षा करने लगे ॥ १४ ॥

निहतौ भ्रातरौ दृष्ट्वा मायाशतविशारदः ।